भुवनेश्वर, पुरी, कोणार्क, धौला गिरि की गुफाएं, विश्व शांति स्तूप और सम्राट अशोक शिलालेख की यात्रा, दिनॉंक : 25 दिसम्बर 2025 से 03 जनवरी 2026 तक

डॉ. राजबहादुर मौर्य, असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, बुंदेलखंड कॉलेज झाँसी (उत्तर- प्रदेश) भारत ।
email : drrajbahadurmourya@gmail.com, website: themahamaya.com

यात्रियों का परिचय : डॉ. राजबहादुर मौर्य, झाँसी, मैम श्रीमती कमलेश मौर्या, झाँसी, (उत्तर- प्रदेश) इंजीनियरिंग सपना मौर्या, गुड़गांव, सौरभ भाई, गुड़गांव, (हरियाणा) अरबाज़ उर्फ़ राजा (गाड़ी मालिक और चालक इनोवा क्रिस्टा) झाँसी (उत्तर- प्रदेश)

यात्राओं का महत्व : दुनिया बहुत खूबसूरत है और यहाँ पर सीखने, समझने, लिखने, प्रशंसा करने और संजोने के लिए बहुत कुछ है… यह बात हम यात्राओं के ज़रिए ही समझ पाते हैं । नए दोस्त, नया परिवेश, नया अनुभव, नया खानपान, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता का विकास यात्राओं के माध्यम से ही होता है । यात्राएँ हमें समाज के अन्य विभिन्न समुदायों और उनके दृष्टिकोणों तथा तौर तरीक़ों के प्रति सराहना, समझ और सम्मान प्रदान करती हैं । यात्राएँ हमें पूर्वाग्रहों और निराशाओं से उबारती हैं । हमें यह एहसास होता है कि ख़ुशी और ग़म की एक दुनिया उनसे बाहर भी बसती है… सचमुच जीवन एक यात्रा है… तो आइए हम अपनी यात्रा में आपको साझेदार बनाते हैं और ले चलते हैं पूर्वी भारत की खूबसूरत यात्रा पर..!

भूमिका : पिछले वर्ष 24 सितंबर से 30 सितंबर, 2025 तक की अपनी 10 दिवसीय बिहार यात्रा के दौरान मुझे सपरिवार सासाराम, औरंगाबाद , बोधगया, राजगीर, नालन्दा, पटना, आरा, बक्सर, बलिया और लखनऊ के भ्रमण का मौक़ा मिला । इस यात्रा को पूरा कर जब मैं वापस झाँसी लौटा तभी जानकारी मिली कि वर्ष 2025 की ऑल इंडिया पॉलिटिकल साइंस कॉन्फ़्रेंस का इस साल का आयोजन, दिनांक 27 एवं 28 दिसम्बर को उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में, कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में किया जा रहा है । यद्यपि मैं अभी यात्रा से वापस लौटा था इसलिए मैंने इस आयोजन में सुनिश्चित रूप से हिस्सा लेने का फ़ैसला अभी नहीं लिया । इसी बीच मेरे दो शोधार्थी प्रीती शिवहरे और विशाल शर्मा मिलने आए । बातचीत के दौरान उन लोगों ने यह इच्छा ज़ाहिर किया कि सर अगर आप भुवनेश्वर चलने का विचार करें तो हम लोग भी आपके साथ इस वार्षिक कांफ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए तैयार हैं । मैंने उनसे कहा कि चलिए पहले आने- जाने का टिकट मिल जाए तो आगे देखा जाए ।

तब तक कांफ्रेंस में प्रस्तुत करने के लिए एक- एक रिसर्च पेपर तैयार कर लिया जाए । इधर सभी ने जुटकर अपना- अपना रिसर्च पेपर तैयार किया और उधर यात्रा की तिथि से ठीक 60 दिन पहले, दिनांक 25 अक्टूबर, 2025 को बेटी इंजीनियर सपना मौर्या ने मेरा और अपनी मॉम का एसी द्वितीय श्रेणी का झॉंसी से भुवनेश्वर तक का, हीराकुण्ड एक्सप्रेस (ट्रेन नंबर 20808) से टिकट बुक कर दिया । विशाल शर्मा ने अपने साथ मेरा भी रजिस्ट्रेशन कम्पलीट करवाया और रिसर्च पेपर को सुव्यवस्थित कर आयोजकों को भेज दिया । अगले कुछ दिनों में रिसर्च पेपर का एक्सेपटेंस और बुलावा पत्र भी आ गया । एकेडमिक रूप से मेरी जाने की पूरी तैयारी हो गई लेकिन अभी मैम गॉंव (रायबरेली) में ही थीं । इसलिए ससपेंस यह था कि यह यात्रा हो पायेगी या नहीं । बहरहाल, यात्रा से ठीक दो दिन पहले दिनांक 23-12-2025 को मैम झाँसी वापस आ गईं । अब यह लगभग तय हो चुका था कि हमें उड़ीसा की यात्रा करनी है । लेकिन इसी बीच मुझे एक अति आवश्यक काम से दिनांक 24-12-2025 को लखनऊ जाना पड़ा और वहाँ काम निबटाते हुए मुझे रात के लगभग 10 बज गये ।


जब रात में लखनऊ से निकले तब भयंकर रूप से कोहरे का सामना करना पड़ा और एक बार तो मुझे लगा कि अब रात में यात्रा करना सम्भव नहीं होगा लेकिन गाड़ी चालक राजा की समझदारी और सूझबूझ से ख़तरे का सामना करते हुए हमने यात्रा जारी रखी और रात्रि के अंतिम प्रहर में क़रीब 4 बजे झाँसी आ गये । शारीरिक और मानसिक थकान के बावजूद पूर्वी भारत की यात्रा करने की चाहत ने हमें थकान से उबार लिया और तय समय पर राजा ने अपनी गाड़ी से मुझे और मैम को वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई रेलवे स्टेशन, झाँसी पहुँचा दिया । आशा और उल्लास के मानसिक प्रवाह में हमने अपनी यात्रा प्रारम्भ की । यहाँ चलते समय मेरी एक अन्य शोध छात्रा शुभी यादव अपने छोटे भाई के साथ रेलवे स्टेशन पर मुझे यात्रा की शुभकामनाएँ देने आयीं । प्रीती शिवहरे, विशाल शर्मा और मैम के साथ हमने पहली बार पूर्वी भारत की यात्रा प्रारम्भ की ।

झाँसी से भुवनेश्वर की ट्रेन यात्रा, दिनांक 25, 26 दिसम्बर, 2025 : झाँसी रेलवे स्टेशन जिसे अब वीरांगना लक्ष्मीबाई रेलवे स्टेशन के नाम से जाना जाता है पर हमारी ट्रेन हीराकुंड एक्सप्रेस का जाने का निर्धारित समय 2 बजकर 23 मिनट था लेकिन यह ट्रेन लगभग एक घंटे की देरी से आई और यहाँ से लगभग 4 बजे रवाना हुई । पंजाब के शहर अमृतसर से चलकर आने वाली हीराकुंड एक्सप्रेस ट्रेन आन्ध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम स्टेशन तक चल कर जाती है । कुल 48 घंटे 5 मिनट की अपनी निर्धारित अवधि में यह ट्रेन क़रीब 2570 किलोमीटर की दूरी तय करती है । अमृतसर, लुधियाना, नई दिल्ली, आगरा, झाँसी, बीना मालखेडी, सागर, दमोह, कटनी मुरवारा, शहडोल, बिलासपुर, रायगढ़ होते हुए लगभग 4 बजे यह उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर पहुँचती है । इस ट्रेन की औसत रफ़्तार 53 किलोमीटर प्रति घंटा है । झाँसी से भुवनेश्वर की दूरी क़रीब 1270 किलोमीटर है और यह ट्रेन इस दूरी को लगभग 24 घंटे में तय करती है । झाँसी से निकलने के बाद ट्रेन के इस रूट पर बुंदेलखंड का पहाड़ी और पठारी हिस्सा देखने को मिलता है । लगभग अनुपजाऊ सा यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से बहुत ख़ूबसूरत है ।

झांसी रेलवे स्टेशन से पुरी, उड़ीसा के लिए रवाना

मध्य प्रदेश के सागर स्टेशन को पार करने के बाद इस रूट पर देश का आदिवासी बहुल इलाक़ा आ जाता है जो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से लेकर उड़ीसा तक फैला हुआ है । यह आर्थिक रूप से बहुत अधिक सम्पन्न न होते हुए भी प्राकृतिक संसाधनों तथा सुंदरता से परिपूर्ण क्षेत्र है। यहाँ साफ़ सुथरे पहाड़, नदियों की निर्मल जलधारा, स्वच्छंद विचरण करते जंगली जानवर आपको प्रकृति के नज़दीक ले जाते हैं । यहाँ के रेलवे स्टेशनों पर स्थानीय उत्पाद प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं । कटनी मुरवारा रेलवे स्टेशन पर खूब स्वादिष्ट पकौड़ियाँ खाने को मिलती हैं । कटनी मुरवारा का यह रेलवे स्टेशन नया बनाया गया है जो कटनी के मुख्य रेलवे स्टेशन से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर है । उड़ीसा और दिल्ली की ओर जाने वाली गाड़ियां अब यहीं से कट जाती हैं । यद्यपि हीराकुण्ड एक्सप्रेस ट्रेन में खाने- पीने की सुविधा उपलब्ध रहती है बावजूद इसके आप इस रूट के स्टेशनों पर स्थानीय व्यंजनों का स्वाद ले सकते हैं । लगभग एक घंटे की देरी से हमारी ट्रेन दिनांक 26 दिसम्बर को सायंकाल 5 बजे भुवनेश्वर स्टेशन पहुँच गयी । भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन देश के पूर्वी तट रेलवे का मुख्यालय है जिसे विश्व स्तरीय सुविधाओं के साथ विकसित किया जा रहा है ।

यह शहर के मास्टर कैंटीन चौक के पास स्थित है । चूँकि बेटी इंजीनियर सपना मौर्या एक दिन पहले ही भुवनेश्वर पहुँच चुकी थी इसलिए वह पूर्व निर्धारित समय पर हम लोगों को रिसीव करने के लिए स्टेशन पर आ गयी थी । मैंने ट्रेन से उतरकर सबसे पहले कलिंगा की ऐतिहासिक धरती को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया और तत्पश्चात् बेटी से मिले । मॉं, बेटी, पिता के गर्मजोशी से मिलन ने सफ़र की पूरी थकान को दूर कर दिया । जैसे लगा कि हम एकदम तरोताज़ा हो गए । बच्चों ने स्टेशन से बाहर आकर टैक्सी बुक किया और अगले कुछ ही मिनटों में हम अपने गन्तव्य पर पहुँच गए ।

भुवनेश्वर के होटल क्रिस्टल अर्बन पार्क में : भुवनेश्वर शहर में हमारे ठहरने की व्यवस्था बच्चों ने रेलवे स्टेशन के नज़दीक ही स्थित होटल क्रिस्टल अर्बन पार्क में की थी । शहर के बीचोंबीच स्थित यह एक सुसज्जित होटल था । यहाँ रहने, खाने- पीने, गाड़ी पार्किंग और सुरक्षा की बेहतर व्यवस्था थी । होटल पहुँच कर सभी ने गरमागरम चाय ली और थोड़ा विश्राम किया । अब तक शाम के लगभग 7 बज गए थे इसलिए आज कहीं बाहर जाने का कार्यक्रम नहीं रखा गया । रात के लगभग 9 बजे होटल में ही बच्चों के बातचीत करते हुए रात्रि का भोजन किया और फिर अपने- अपने कमरों में सोने चले गए ।

भुवनेश्वर की पहली सुबह दिनांक : 27-12-2025 : कई दिनों की थकान और सफ़र के बाद पिछली रात में अच्छी नींद आयी और जब जगे तब सुबह के साढ़े सात बज गए थे । शीघ्र ही बच्चों ने चाय का आर्डर किया और सभी ने काफ़ी दिनों बाद बाद साथ बैठकर, भुवनेश्वर शहर में पहली बार चाय पिया । सुबह में यहाँ मौसम में हल्की सी सर्दी थी जो उत्तर भारत की तुलना में बहुत ही सामान्य थी । होटल के टैरिफ़ पर जाकर मैंने सुबह- सुबह शहर को भरपूर नज़रों से देखा और अपने रहबर, अपने ईश्वर का शुक्रिया अदा किया कि मैं जीवन में पहली बार यहाँ आ पाया । सुबह भुवनेश्वर शहर का नज़ारा बहुत खूबसूरत लग रहा था । हल्की धुंध में लिपटा शहर मानो जैसे सुबह की अँगड़ाई ले रहा हो । दिल में ख़याल आया कि यही वह ऐतिहासिक कलिंग नगरी थी जिसने शक्तिशाली मगध नरेश सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन किया था और उन्हें हिंसा का परित्याग कर ज्ञान, शांति और प्रगति के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया था । आज यहाँ आकर स्वाभिमानी कलिंग की भूमि का प्रत्यक्ष दर्शन करने और सम्राट अशोक की करुणा भूमि को नमन् करने का पुनीत सौभाग्य मिला ।

भुवनेश्वर में एक दुकान पर
भुवनेश्वर में एक दुकान पर


चूँकि होटल में सुबह का नाश्ता काम्पलीमेंट्री था अर्थात् होटल के कमरे के किराये में ही सम्मिलित था, अलग से पैसा नहीं देना था इसलिए सभी ने तैयार होकर सुबह का नाश्ता किया । नाश्ता अच्छा था । नाश्ते में चाय, कॉफ़ी, ब्रेड बटर, पोहा, पूरी सब्ज़ी, अंडे, फल और डोसा सम्मिलित था । आमतौर पर देश के अन्य हिस्सों में होटलों में काम्पलीमेंट्री नाश्ते में इतने विकल्प नहीं होते लेकिन भुवनेश्वर में यह सब उपलब्ध था । सभी ने अपनी पसंद का नाश्ता किया और आज के भ्रमण के लिए तैयार होने के लिए अपने- अपने कमरों में चले गए । ठीक 11 बजे हम सभी तैयार होकर होटल में नीचे रिसेप्शन के पास आ गए । बच्चों ने टैक्सी बुक किया और हम सभी अपने पहले विज़िट प्वाइंट “कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़” के भ्रमण के लिए निकल पड़े ।

अपने अंतस्तल में लगभग 3000 हज़ार साल पुराने इतिहास को संजोए हुए, भुवनेश्वर पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण शैक्षिक व सांस्कृतिक केन्द्र है जिसके अतीत में एक गौरवशाली विरासत है । इसे मंदिरों का शहर कहा जाता है क्योंकि यहाँ लगभग 700 से अधिक प्राचीन मंदिर हैं । शहर के बीचोंबीच स्थित लिंगराज मंदिर अपनी प्राचीनता और अदभुत शिल्पकला के लिए विख्यात् है । यहाँ हिन्दू, बौद्ध और जैन विरासत का अनुपम संगम है । यह शहर उड़ीसा के पूर्वी तट पर, महानदी के डेल्टा के पास स्थित है और खुर्धा (खोरधा) जनपद के अंतर्गत आता है । यद्यपि उड़िया यहाँ की मुख्य भाषा है लेकिन हिंदी और अंग्रेज़ी यहाँ भरपूर बोली और समझी जाती है । उड़िया भाषा की व्युत्पत्ति मागधी प्राकृत भाषा से माना जाता है । किसी भी टैक्सी चालक या होटल अथवा दुकान पर आप सामान्य रूप से हिन्दी बोल कर अपना परिचय और बातचीत कर सकते हैं । होटल से चलकर कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ तक पहुँचने में लगभग एक घंटे का समय लगा । इस दौरान मैंने इस खूबसूरत शहर को प्रत्यक्ष रूप से और नज़दीक से देखा । शहर में सड़कें खूब चौड़ी हैं और यातायात सुव्यवस्थित है ।

भुवनेश्वर में एक पुस्तक भंडार पर
भुवनेश्वर में

उद्यान और पार्क खूब विकसित किए गए हैं । शहर के उत्तरी और पश्चिमी भाग में पहाड़ियाँ हैं । रास्ते में ही मैंने राज्य की विधानसभा, सचिवालय, मुख्यमंत्री आवास और मंत्रियों के आवास के साथ ही राजभवन को भी देखा । उत्कल विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के पास से भी गुज़रे । बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भुवनेश्वर का हवाई अड्डा है । यहाँ से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित होती हैं । शहर को देखते- देखते हमारी गाड़ी कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ के सुसज्जित और शैक्षिक संस्थान में आ गयी । ड्राइवर ने गाड़ी को पार्क किया और हम लोग आयोजन स्थल पर पहुँच गए ।

कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में… कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ के भव्य और सुसज्जित सभागार में अखिल भारतीय राजनीति विज्ञान संघ का 62 वाँ वार्षिक सम्मेलन आयोजित किया गया था । 27 एवं 28 दिसम्बर को आयोजित इस दो दिवसीय बौद्धिक सम्मेलन की थीम थी “हम भारत के लोग” । सम्मेलन में चर्चा के विषय थे : संवैधानिक लोकतंत्र, भारतीय ज्ञान प्रणाली, वैश्विक राजनीति, एआई और शासन, लैंगिक राजनीति और न्याय । सम्मेलन का उद्देश्य राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में शोध, शिक्षा और नीति- निर्माण को बढ़ावा देना तथा विद्वानों को एक साथ लाना । इस सम्मेलन में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, विभागाध्यक्ष, शोधकर्ताओं और छात्रों सहित लगभग 3000 विद्वानों ने हिस्सा लिया । मैंने भी उद्घाटन सत्र में इस कार्यक्रम में शिरकत की और विद्वानों के विचारों का लाभ उठाया ।

आल इंडिया पोलिटिकल सांइस के वार्षिक अधिवेशन, कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, भुवनेश्वर में
आल इंडिया पोलिटिकल सांइस के वार्षिक अधिवेशन, कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, भुवनेश्वर में

मेरे साथ मेरी पत्नी श्रीमती कमलेश मौर्या, बेटी इंजीनियर सपना मौर्या और गुड़गांव के मेरे पारिवारिक सदस्य सौरभ कुमार ने भी कलिंगा इंस्टीट्यूट के भव्य, सुंदर और सुसज्जित परिसर का भ्रमण किया और फ़ोटोग्राफ़ी की । वस्तुतः वर्ष 1993 में डॉ. अच्युत सामंत द्वारा स्थापित कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ भुवनेश्वर देश का एक बहुत बड़ा और आवासीय शिक्षा संस्थान है । यह छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा स्थापित और यूजीसी द्वारा अनुमोदित एक राज्य निजी विश्वविद्यालय है । संस्थान का मुख्य उद्देश्य आदिवासी बच्चों और युवाओं को शिक्षा, आवास और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना है । इस संस्थान का लक्ष्य ग़रीबी, भुखमरी और निरक्षरता को समाप्त करना है ।
दुनिया के पहले आदिवासी केन्द्रित इस विश्वविद्यालय को यूजीसी के द्वारा वर्ष 2017 में डीम्ड टू बी का दर्जा दिया गया है । यह संस्थान 80,000 हजार से अधिक आदिवासी बच्चों और युवाओं को प्राथमिक शिक्षा से लेकर पीएचडी तक की शिक्षा मुफ्त में उपलब्ध कराता है । यह दुनिया का सबसे बड़ा आवासीय संस्थान है जो आदिवासी बच्चों के लिए काम करता है । संयुक्त राष्ट्र संघ के सतत विकास लक्ष्यों को सही मायने में लागू करने के साथ इस संस्थान ने माओवादी और नस्लवादी उग्रवाद के प्रसार को रोककर ओड़िशा और उसके पड़ोसी राज्यों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आवश्यक सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । यद्यपि इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक, मध्य प्रदेश पहले से स्थापित है लेकिन उसमें सभी श्रेणियों के छात्र पढ़ते हैं ।

विश्व शांति स्तूप, भुवनेश्वर का दर्शन : कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ से निकलकर हम लोग विश्व शांति स्तूप के दर्शन और वंदन करने के लिए निकले । लगभग एक घंटे के सफ़र के बाद तक़रीबन तीन बजे हमारी गाड़ी इस स्तूप के पास पहुँच गयी । वहाँ पर जाने से पहले हम सभी ने रास्ते में रुककर चाय और बिस्किट का स्वल्पाहार लिया तथा पानी की बोतलें ली गयीं क्योंकि यहाँ दोपहर बाद का मौसम गर्म था । मैम को यहाँ स्थानीय निर्मित बिस्किट बहुत पसन्द आये और उन्होंने एक किलो अतिरिक्त बिस्किट ख़रीदा । बाद में यही जगह- जगह भ्रमण में खाने के काम आये । जहाँ पर गाड़ी ने हम सब को उतारा वहाँ से शांति स्तूप की दूरी मात्र 500 मीटर थी इसलिए हम लोग पैदल चलकर शांति स्तूप के परिसर में पहुँच गये । पूरे अनुशासन और श्रद्धा के साथ सभी ने जूते- चप्पल उतार कर माथा टेका, भगवान् तथागत बुद्ध को नमन् और वंदन कर आशीर्वाद लिया । श्रद्धा, करुणा, मैत्री के साथ हम सब ने शांति स्तूप की परिक्रमा की और सभी के लिए मंगलकामना की ।

िश्व शांति स्तूप, भुवनेश्वर, उड़ीसा में…
िश्व शांति स्तूप, भुवनेश्वर, उड़ीसा में…

सचमुच जीवन में पहली बार मिले इस सुअवसर से हम सब अभिभूत थे । जीवन में जब संचित पुण्य फलित होते हैं तब ऐसे पावन और पवित्र स्थानों के वन्दन और नमन् का सौभाग्य मिलता है । भुवनेश्वर शहर से लगभग 8 किलोमीटर दक्षिण में, दया नदी के किनारे, धौली पहाड़ी पर स्थित इस शांति स्तूप को धौली शांति स्तूप के नाम से भी जाना जाता है । वर्ष 1972 में जापानी बुद्ध संघ और कलिंग निप्पॉन बुद्ध संघ द्वारा निर्मित यह शांति स्तूप वैश्विक शांति, करुणा और अहिंसा का प्रतीक है जो कलिंग युद्ध के भीषण रक्तपात के बाद मगध नरेश सम्राट अशोक के पश्चाताप को दर्शाता है । सफेद संगमरमर पत्थर से निर्मित इस विशाल स्तूप में तथागत बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में चार विशाल मूर्तियाँ हैं । इसके अतिरिक्त यहाँ सांची स्तूप की प्रतिकृति शिल्पकारी भी की गयी है । पूरी दुनिया में बनाये गए शांति स्तूपों की तरह यहाँ भी मानसिक शांति का अद्भुत अनुभव होता है । यहाँ से निकलकर हमारा अगला पड़ाव सम्राट अशोक का धौली शिलालेख था ।

सम्राट अशोक का धौली शिलालेख : विश्व शांति स्तूप के पास काफ़ी भीड़ रहती है इसलिए यहाँ से निकलने में हमें थोड़ा वक़्त लग गया । लेकिन पुलिस और प्रशासन की मुस्तैदी के कारण यहाँ जाम की समस्या नहीं होती । धौली शांति स्तूप से लगभग 15 मिनट चलने पर उसी सड़क पर हमारी गाड़ी सम्राट अशोक के धौली शिलालेख पर पहुँच गयी । ड्राइवर ने गाड़ी को पार्क किया और हम लोग सड़क पार कर शिलालेख के पास पहुँच गये । मैंने अपनी ऑंखों से प्रत्यक्ष रूप से देखा कि एक विशाल चट्टान पर मगध नरेश सम्राट अशोक का शिलालेख मौजूद है । आज इसे सरकार द्वारा काँच से ढंककर संरक्षित कर दिया गया है । इस शिलालेख की भाषा मागधी प्राकृत और लिपि ब्राह्मी है । यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्राचीन ब्राह्मी लिपि बाएं से दाएँ लिखी जाती थी जबकि खरोष्ठी लिपि दाएँ से बाएँ को लिखी जाती थी । सम्राट अशोक के शाहबाजगढी और मानसेहरा के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में लिखे गए हैं ।

सम्राट अशोक का धौलागिरी शिलालेख भुवनेश्वर, उड़ीसा में…
सम्राट अशोक का धौलागिरी शिलालेख भुवनेश्वर, उड़ीसा में…

यह स्थान भी महानदी की सहायक नदी दया नदी के बिल्कुल बाएं किनारे पर स्थित है और भुवनेश्वर शहर से मात्र 8-10 किलोमीटर की दूरी पर है । यहीं पर ईसा पूर्व 262 से 261 तक इतिहास प्रसिद्ध कलिंग का युद्ध हुआ था । यह युद्ध धौली पहाड़ियों पर लड़ा गया था । कहा जाता है कि इस युद्ध के भीषण रक्तपात से दया नदी का पानी खून से लाल हो गया था । इस युद्ध के रक्तपात ने सम्राट अशोक को झकझोर दिया और उन्हें अपराध बोध हुआ । परिणामस्वरूप उन्होंने आजीवन युद्ध न करने की प्रतिज्ञा ली । इस स्तम्भ में सम्राट अशोक के जीवन से जुड़े तथ्यों का वर्णन किया गया है । राजा अशोक ने कलिंग युद्ध के लिए अपने खेद को व्यक्त किया है और धम्म के सिद्धांतों के अनुसार राज्य का शासन करने के अपने इरादे को स्पष्ट किया है ।इसमें अशोक के राज्याभिषेक के 8 वें वर्ष में कलिंग विजय का उल्लेख है । इसके साथ ही सीमावर्ती राज्यों और पाँच यूनानी राजाओं के नाम भी इस पर लिखे गए हैं । सम्राट अशोक ने इस शिलालेख में पशु वध और समारोहों पर होने वाले अनावश्यक खर्च की निंदा की है और लिखा है कि सभी मनुष्य मेरी संतान की तरह हैं । भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा यह संरक्षित किया गया है और पास में ही इस शिलालेख में अंकित शब्दों का अंग्रेज़ी, हिन्दी और उड़ीसा भाषा में अनुवाद करके लगाया गया है ताकि आसानी से अपनी भाषा में इसको पढ़ा जा सके ।

सम्राट अशोक का धौलागिरी शिलालेख भुवनेश्वर, उड़ीसा में…
सम्राट अशोक का धौलागिरी शिलालेख भुवनेश्वर, उड़ीसा में…

यह शिलालेख जिस स्थान पर लिखा गया है उसके ऊपरी भाग में चट्टान को काटकर हाथी की गर्दन उकेरी गई है जो उस समय की शिल्पकारी का अद्भुत उदाहरण है । चट्टान पर उकेरा गया यह हाथी चट्टान से बाहर निकलता हुआ प्रतीत होता है । यह सम्राट अशोक के हिंसक राजा से शान्तिप्रिय बौद्ध शासक बनने के परिवर्तन का प्रतीक है । बौद्ध धम्म में हाथी भगवान् बुद्ध के जन्म का भी प्रतिनिधित्व करता है । ऐसी शिल्पकारी को बच्चों के साथ मैं भी बड़ी देर तक एकटक पलकों से निहारता रहा और प्राचीन भारत के उस कालखंड को याद करता रहा । बच्चों ने यहाँ पर फ़ोटोग्राफ़ी की और मैंने भी उत्सुकता से एक छोटी वीडियो क्लिप बनाई । यहाँ से निकलने में हम सभी को शाम के 5 बज चुके थे इसलिए अब और कहीं जाने का समय नहीं था और हम लोग वापस अपने विश्राम स्थल होटल क्रिस्टल अर्बन पार्क में वापस आ गए । होटल में आकर हम सब ने गर्मागर्म चाय पी और पूरे दिन किए गए भ्रमण पर चर्चा करते रहे । देर रात सभी ने भोजन किया और अपने- अपने कमरों में जाकर सो गए ।

सम्राट अशोक का धौलागिरी शिलालेख भुवनेश्वर, उड़ीसा में…
सम्राट अशोक का धौलागिरी शिलालेख भुवनेश्वर, उड़ीसा में…

भुवनेश्वर से पुरी और पुरी से कोणार्क : दिनांक 28-12-2025 पिछले पूरे दिन की अत्यधिक व्यस्त यात्रा के कारण रात में कब नींद आ गयी, पता ही चला और जब जगे तो सुबह के 7 बज गए थे । बच्चों ने चाय का आर्डर दिया और सभी ने गर्मागर्म चाय ली । हल्के वार्मअप के बाद सभी लोग नहा धोकर कॉम्प्लिमेंटरी नाश्ते के लिए कमरे से निकल कर होटल में स्थित रेस्टोरेंट में आ गए । सभी ने अपनी पसंद का नाश्ता किया और वापस कमरे में आकर अगले सफ़र के लिए तैयार हो गए । चूँकि आज का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम भुवनेश्वर से पुरी पहुँचना था और वहीं अगले दो दिन रुकना था इसलिए बच्चों ने बड़ी टैक्सी बुक किया ताकि सभी लोग आराम से बैठ सकें और सभी सामान भी आ जाए । ठीक 11 बजे होटल के गेट पर टैक्सी आ गयी । सुव्यवस्थित ढंग से सारा सामान गाड़ी में रखा गया और हम सब ने होटल क्रिस्टल अर्बन पार्क को अलविदा कह भगवान् जगन्नाथ की नगरी पुरी के लिए प्रस्थान किया । तीव्र गति से चलती हुई हमारी गाड़ी ने देखते ही देखते भुवनेश्वर शहर को पार किया और राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या… पर आ गयी ।

तेज रफ़्तार से चलती हुई गाड़ी के दोनों ओर धान की फसल के कटे हुए खेत दिखाई पड़ रहे थे । गेहूँ की फसल कहीं नज़र नहीं आई तो मैंने ड्राइवर से पूछा कि भाई जी क्या यहाँ गेहूँ की फसल नहीं होती तो उसने तपाक से जवाब दिया कि नहीं । यहाँ गेहूँ की फसल नहीं होती । तब समझ में आया कि इसीलिए यहाँ चावल अधिक मात्रा में खाने में इस्तेमाल किया जाता है । सड़क के दोनों ओर दूर- दूर तक नारियल से लदे हुए पेड़ बहुत ही सुंदर दिख रहे थे । भुवनेश्वर से पुरी तक की यात्रा लगभग 100 किलोमीटर के आसपास हो जाती है । देखते ही देखते हम भगवान् जगन्नाथ की नगरी पुरी पहुँच गए । पुरी में हमारा रुकने का ठिकाना होटल पुष्पा में था । ड्राइवर ने गूगल के ज़रिए होटल पुष्पा तक बड़ी आसानी से हम सब को पहुँचा दिया । बच्चों ने सबकी आईडी लगाई और होटल में चेक इन किया । सभी ने कमरों में सामान शिफ़्ट किया और एक-एक कप चाय पी । इसी बीच बच्चों ने कोणार्क जाने के लिए टैक्सी बुक की । हम सभी लोग रिफ़्रेश होकर पुनः अगले सफ़र के लिए निकल पड़े ।

कोणार्क सूर्य मन्दिर का भ्रमण : पुरी से कोणार्क की दूरी लगभग 40 किलोमीटर है । आमतौर पर यदि कहीं रास्ते में जाम की समस्या न हो तो यहाँ एक घंटे में आसानी से पहुँचा जा सकता है । सड़क के दोनों तरफ़ काजू, चीकू और बादाम के वृक्ष हैं जो अनायास ही पर्यटकों को आकर्षित करते हैं । यहीं रास्ते में एक स्थान पर रुककर हम लोगों ने दोपहर का भोजन किया । लगभग ग्रामीण क्षेत्र में बने हुए इस ढाबे का खाना कम पैसों में और बहुत स्वादिष्ट मिला । हम लोगों को पुरी से निकलते हुए लगभग ढाई बज गया था और उस दिन रास्ते में कई जगह भयंकर रूप से जाम की समस्या का सामना पड़ा । इसलिए लगभग 4 बजे हमारी गाड़ी कोणार्क मंदिर के परिसर में पहुँची । ड्राइवर ने गाड़ी को पार्किंग में खड़ी किया और हम लोग टिकट लेकर कोणार्क के सूर्य मंदिर में पहुँच गये । मैंने जीवन में पहली बार कलिंग शैली से निर्मित इतनी भव्य संरचना का दीदार किया था । लाल रंग के बलुआ पत्थर तथा काले ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित कोणार्क मंदिर वाक़ई यह अद्भुत और बेजोड़ शिल्पकला का अनुपम उदाहरण है ।

विश्व विरासत कोणार्क के सूर्य मंदिर परिसर में…
विश्व विरासत कोणार्क के सूर्य मंदिर परिसर में…
विश्व विरासत कोणार्क के सूर्य मंदिर परिसर में…

कोणार्क मंदिर की बनावट और इंजीनियरिंग कौशल को देखकर कोई भी व्यक्ति दांतों तले उँगली दबा लेता है । इस मंदिर की नींव से थोड़ा ऊपर आधार में बारह जोड़े विशाल पत्थर के पहिए उकेरे गए हैं और इसे सात शक्तिशाली घोड़े तेज़ी से खींच रहे हैं । ये 12 चक्र साल के 12 महीनों को दर्शाते हैं तथा प्रत्येक चक्र में आठ आरे हैं जो दिन के आठ प्रहरों को दर्शाते हैं । इसके प्रवेश द्वार पर एक अद्भुत संरचना है दो शेर हाथियों पर आक्रमण करते हुए दिखाए गए हैं और हाथी के नीचे एक मनुष्य की आकृति है । मंदिर के दक्षिणी भाग में दो सुसज्जित घोड़े बने हुए हैं जिन्हें उड़ीसा सरकार ने अपने राजचिह्न के रूप में अंगीकार किया है । आधार से लेकर शिखर तक इस मंदिर की ऊँचाई लगभग 227 फ़ीट है । बंगाल की खाड़ी के समुद्र तट से लगभग सटा हुआ, चन्द्रभागा नदी के किनारे, प्राकृतिक रूप से अति ख़ूबसूरत कोणार्क के सूर्य मन्दिर का निर्माण 13 शताब्दी में गंग राजवंश के शासक नरसिंह देव प्रथम के द्वारा करवाया गया था । वर्ष 1984 में इस मन्दिर को संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल किया । कोणार्क के इस ऐतिहासिक मन्दिर को 1200 मज़दूरों और कारीगरों ने मिलकर 12 वर्षों में बनाया है ।

कोणार्क मंदिर के नाम पर ही यहाँ पर आबाद शहर का नाम भी कोणार्क है । यहाँ से राष्ट्रीय राजमार्ग 316 A गुजरता है । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कोणार्क मंदिर का भ्रमण करने के बाद लिखा था कि, “कोणार्क मंदिर में पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठ है ।” इस मंदिर परिसर का भ्रमण करते हुए शाम के 6 बज गए और समय का पता ही नहीं चला । बच्चों और मैम ने यहाँ पर खूब फ़ोटोग्राफ़ी की और मैने भी एक छोटी वीडियो क्लिप बनाई । टैक्सी ड्राइवर ने फ़ोन कर वापस चलने का आग्रह किया । सभी लोग मंदिर परिसर से बाहर निकले और वहाँ लगे एक मेले का भी भ्रमण किया । स्थानीय स्तर पर लगने वाले इस मेले में वहाँ के स्थानीय उत्पाद सस्ते दामों पर उपलब्ध रहते हैं लेकिन भीड़भाड़ काफ़ी होती है । मैम और बेटी ने यहाँ पर कुछ ख़रीददारी की । वापस आते समय वहीं कैंटीन में सौरभ ने सभी को गर्मागर्म कॉफ़ी पिलाई । काफ़ी अच्छा लगा । चूँकि कोणार्क सूर्य मंदिर समुद्र तट पर स्थित है इसलिए बच्चों के साथ मैंने भी इस ख़ूबसूरत समुद्र तट का दीदार किया ।

विश्व विरासत कोणार्क के सूर्य मंदिर परिसर में…
विश्व विरासत कोणार्क के सूर्य मंदिर परिसर में…

समुद्र तट पर बहती हुई सर्द पवन जैसे कानों में कुछ गुनगुना रही थी । मानो वह कह रही थी कि अभी कुछ देर तक और ठहरो, लेकिन समय अब इजाज़त नहीं दे रहा था । यह भारत का पहला ब्लू फ़्लैग प्रमाणित समुद्र तट है । यहाँ से लगभग 7 बजे हम लोग वापस पुरी के लिए निकले । रात लगभग आठ बजे हम लोग वापस पुरी आ गए । वहीं होटल के पास एक सुसज्जित रेस्टोरेंट में रात का भोजन किया और रात्रि में समुद्र की लहरों को देखने के लिए दरिया के तट पर पहुँचे । मैंने देखा कि रात्रि में भी समुद्र की लहरें निरंतर उठती रहती हैं । देर रात सभी लोग होटल में आ गए और रात्रि विश्राम किया

भगवान् जगन्नाथ के दर पर… दिनांक : 29-12-2025 आज का दिन मेरे लिए और मेरे परिवार के लिए सौभाग्य का दिन था । जहाँ तक मुझे याद पड़ता है मेरे अपने घर- परिवार में पहली बार मैं स्वयं, मेरी पत्नी श्रीमती कमलेश मौर्या, बेटी इंजीनियर सपना और मेरे पारिवारिक सदस्य सौरभ ने एक साथ परम पावन भगवान जगन्नाथ मंदिर का दर्शन किया, माथा टेका, आशीर्वाद लिया और सभी की ख़ुशहाली के लिए प्रार्थना किया । इसके पहले कोई भी मेरे परिवार का सदस्य यहाँ तक नहीं पहुँचा । यद्यपि आज यहाँ बहुत अधिक भीड़ थी लेकिन भगवान के दर्शन करते ही तीन घंटे लाइन में खड़े रहने की थकान छू मंतर हो गयी मानो हम एकदम तरोताज़ा हो गए । हम सब ने मंदिर की परिक्रमा की और थोड़ी देर तक प्रभु की शरण में बैठे । मुझे अब तक जीवन में जो कुछ भी मिला उसके लिए मैंने भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त किया और उन सभी लोगों के लिए दुआ माँगी जो मुझे प्यार करते हैं और जिनको मैं प्यार करता हूँ । मैंने अपने दिवंगत पूज्य पिता जी की मुक्ति की कामना की और माँ के लिए स्वस्थ जीवन की भगवान् से याचना की । झाँसी से चलते समय मेरे मित्र फिजियोथेरेपिस्ट डॉक्टर मनोज द्विवेदी ने मुझे अपनी नवीनतम प्रकाशित पुस्तक “पीड़ा से प्रेरणा” और एक शाल तथा एक किलोग्राम मीठा व कुछ दान भेंट किया था ।

भगवान् जगन्नाथ जी के दर पर…
भगवान् जगन्नाथ जी के दर पर…

मैं उस सारी सामग्री को अपने साथ लाया था और आज उसे श्रद्धा और भक्तिभाव से भगवान् के श्रीचरणों में अर्पित कर डॉक्टर साहब के लिए दुआ किया । भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर कलिंग वास्तुशैली में निर्मित है ।मंदिर के शिखर पर चक्र और ध्वज स्थापित है । इस चक्र में आठ आरे हैं । शहर के किसी भी दिशा से आप मंदिर की तरफ़ देखें तो आपको चक्र अपनी ओर मुँह किए ही नज़र आएगा । हिन्दू धर्म में जगन्नाथ पुरी चार धामों में एक धाम है । यह पवित्र मंदिर लगभग चार लाख वर्ग फ़ीट में फैला हुआ है । मंदिर का मुख्य ढाँचा एक 214 फ़ीट ऊंचे पत्थर के चबूतरे पर बना हुआ है जो इसे बहुत मजबूती प्रदान करता है । पूर्व की ओर मंदिर के मुख्य सिंह प्रवेश द्वार पर एक विशाल स्तम्भ भी स्थापित किया गया है । मंदिर के दक्षिण दिशा की ओर के द्वार को अश्व द्वार, पश्चिम दिशा में स्थित द्वार को हस्ति द्वार और उत्तर में स्थित द्वार को व्याघ्र द्वार कहा जाता है । भगवान जगन्नाथ मंदिर का एक बड़ा आकर्षण यहाँ की रसोई है जिसमें 500 रसोइए तथा 300 उनके सहयोगी काम करते हैं । इस मंदिर में गैर हिन्दू लोगों का प्रवेश वर्जित है ।अद्भुत बात है कि जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर ध्वज हवा के विपरीत दिशा में लहराता है । यहाँ ध्वज प्रतिदिन बदला जाता है । इस मंदिर में 22 सीढ़ियाँ हैं । भगवान जगन्नाथ के दर्शन, पूजन और वंदन के बाद हम सभी ने मंदिर की वास्तुशिल्प और उसके कलाकृति को गौर से देखा । ताज्जुब होता है कि जिस दौर में आज की जैसी प्रौद्योगिकी और तकनीक तथा मशीनों का अभाव था उस समय भी कितनी कुशलता और भव्यता के साथ इस मंदिर का निर्माण किया गया होगा ।

भगवान् जगन्नाथ जी के दर पर…
भगवान् जगन्नाथ जी के दर पर…

मंदिर परिसर से बाहर निकलकर हम लोगों ने अपना- अपना मोबाइल फ़ोन उठाया और जूते पहने । बच्चों ने फ़ोटोग्राफ़ी किया और मैम ने कुछ ख़रीददारी किया । गॉंव के मेरे मित्र समर बहादुर सिंह ने मैम से यात्रा में निकलने से पहले आग्रह किया था कि उनके लिए पुरी से भगवान जगन्नाथ की एक फ़ोटो लायी जाए ताकि वह उसे अपने घर पर स्थापित कर सकें । मैम ने बड़ी श्रद्धा के साथ भगवान् जगन्नाथ की फ़ोटो ख़रीदी और गॉंव में स्वयं जाकर दिनांक 15-01-2026 को उन्हें भेंट कर दिया । यहीं मंदिर परिसर के समीप एक होटल में हम लोगों ने दोपहर को भोजन किया । चूँकि सबको तेज़ भूख लगी थी इसलिए वहाँ मिलने वाला दाल, चावल और शब्जी खूब स्वादिष्ट लगी । रोटी वहाँ नहीं मिली । अब तक दोपहर के लगभग ढाई बज गए थे । पुरी की गलियों और बाज़ार को देखते हुए हम लोग होटल पर वापस आ गए । बच्चे समुद्र के तट पर घूमने और देखने के लिए निकल गए । मैंने और मैम ने थोड़ा आराम किया ।

भगवान् जगन्नाथ जी के दर पर…
मेरे शोध छात्र प्रीति शिव हरे और विशाल शर्मा पुरी के एक होटल में पुस्तकें भेंट करते हुए

पुरी के समुद्र तट पर… लगभग एक घंटे के संक्षिप्त विश्राम के बाद मैम मुझे भी अपने साथ लेकर पुरी के समुद्र तट पर आ गई । जिस होटल में हम लोग ठहरे थे वहाँ से समुद्र तट की दूरी मात्र 200 मीटर थी । यहाँ के समुद्र तट को गोल्डन बीच के नाम से भी जाना जाता है । समुद्र तट पर पर्यटकों की काफ़ी भीड़ थी और लोग अपने बच्चों तथा परिवार के साथ समुद्र तट पर घूमने आए हुए थे । इसी भीड़ में चाय वाले, मक्का की भुट्टी बेचने वाले, समुद्र की मोतियां बेचने वाले अपने व्यवसाय में लगे हुए थे । राजस्थान की तरह यहाँ भी ऊँट और घुड़सवारी करने का पूरा आनंद लिया जा सकता है । बच्चे, बुजुर्ग और नौजवान सभी अपनी पसंद और शौक़ के हिसाब से समुद्र तट का लुत्फ उठा रहे थे । मैंने भी मैम से कहा कि अगर आप चाहें तो ऊँट की सवारी कर लें लेकिन उन्होंने मना कर दिया । अलबत्ता समुद्र की लहरों में भीगकर उन्होंने समुद्र तट का मज़ा लिया और मुझसे खूब फ़ोटोग्राफ़ी कराई ।
मैंने भी एक आदर्श पति के रूप में अपना फ़र्ज़ निभाया और उन्हें निराश नहीं किया । बच्चों ने अपने स्तर से खूब मस्ती की । यहाँ के समुद्र तट पर चूँकि यह पर्यटकों के लिहाज़ से बहुत अनुकूल सीज़न रहता है इसलिए खोमचे वाले और फुटकर दुकानदार पर्यटकों को एक की सामान्य दो के भाव में देते हैं । जब तट पर बैठने के लिए एक कुर्सी की सुविधा देने वाले से मैंने रेट पूछा तो उसने प्रति कुर्सी एक घंटे का 50 रुपए बताया । भारत के पूर्वी तट पर स्थित पुरी का समुद्र तट बंगाल की खाड़ी से लगा हुआ है । बहुत ही खूबसूरत रेत से सुसज्जित यह तट भागदौड़ भरी ज़िंदगी में एक सुकून का एहसास कराता है । यहाँ पर घूमने का सबसे अच्छा समय दिसम्बर, जनवरी और फ़रवरी का महीना होता है । यहाँ के बालिघाई बीच पर कैसुआरिना और अलास्का के ख़ूबसूरत वृक्ष हैं जबकि चन्द्रभागा के तट पर आप नीले समुद्र में जेट स्कीइंग का मज़ा ले सकते हैं । यहाँ के चाँदीपुर बीच के शांत वातावरण में खूबसूरत सूर्यास्त की तस्वीरें ले सकते हैं ।
पुरी के इस समुद्र तट पर यात्रियों के ठहरने के लिए पर्याप्त होटल हैं जहाँ से आप सुंदर नीले समंदर का नज़ारा देख सकते हैं । टैक्सी और गाइड की सुविधा भी उपलब्ध रहती है । यहाँ का निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर है । समुद्र की लहरों से उठने वाली गर्जना निरंतर जागरूकता का पैग़ाम देती है । देर रात सभी लोग वापस होटल लौटे और रात का खाना यहीं पर होटल में ही लिया गया । रात्रि के लगभग 10 बजे मेरे शोध छात्र विशाल शर्मा और प्रीती शिवहरे होटल में मिलने आए । सभी ने एक-दूसरे का कुशलक्षेम जाना । रात्रि में ही वह लोग वापस भुवनेश्वर लौट गए क्योंकि अगले दिन सुबह 7 बजे उनकी वापस झाँसी लौटने की ट्रेन थी । मैंने उन्हें बिदा किया और फिर अपने कमरे में जाकर विश्राम किया ।

बंगाल की खाड़ी… भारत के पूर्वी समुद्र तट पर स्थित बंगाल की खाड़ी दुनिया की सबसे बड़ी खाड़ी है जो लगभग 2090 किलोमीटर अर्थात् 1300 मील लम्बी और 1610 किलोमीटर अर्थात् 1000 मील चौड़ी है । इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 2.17 मिलियन वर्ग किलोमीटर है । इसकी औसत गहराई 2600 मीटर अर्थात् 8500 फ़ीट है । बंगाल की खाड़ी भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैण्ड , इंडोनेशिया और श्रीलंका जैसे देशों से घिरी हुई है । भौगोलिक रूप से यह हिंद महासागर का उत्तर- पूर्वी भाग है । इसके पश्चिम में भारत और श्रीलंका, उत्तर में बांग्लादेश और पूर्व में म्यांमार और मलय द्वीप हैं । अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी बंगाल की खाड़ी में अवस्थित हैं । बंगाल की खाड़ी में गंगा, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी और कावेरी जैसी कई बड़ी नदियाँ आकर गिरती हैं । भारत में यह खाड़ी पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश जैसे राज्यों से जुड़ती है । ज्ञातव्य है कि कन्याकुमारी भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ तीन समुद्र : हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर- एक साथ मिलते हैं । कोलकाता, बंगाल की खाड़ी का सबसे बड़ा बंदरगाह है । गंगा नदी बंगाल में हुगली नदी के नाम से जानी जाती है । बंगाल की खाड़ी को वंग सागर और कलिंग सागर के नाम से भी जाना जाता है । बंगाल की खाड़ी में ताजे पानी की आने वाली नदियों की अधिकता के कारण इसकी ऊपरी परत के खारापन कम है ।

उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाओं का भ्रमण, दिनांक : 30-12-2025 पुरी के होटलों में चेक आउट करने का समय सुबह 7 बजे का होता है और चेक इन का समय सुबह 8 बजे का रहता है । मुझे जहाँ तक जानकारी है देश में अन्यत्र कहीं भी ऐसी व्यवस्था नहीं है । इसी व्यवस्था के कारण हम सभी को सुबह हर हाल में सुबह 8 बजे होटल छोड़ना था । बहरहाल सभी लोग सुबह 5 बजे जग गए और सुबह की एक चाय लेकर 7 बजे तक नहा धोकर वापस भुवनेश्वर निकलने के लिए तैयार हो गए । बच्चों ने होटल को चेक आउट किया, टैक्सी बुक किया और भगवान् जगन्नाथ की नगरी पुरी को अलविदा कह कर भुवनेश्वर की राह पकड़ी । रास्ते में रुककर एक होटल में सभी ने नाश्ता किया और लगभग 11 बजे हमारी गाड़ी भुवनेश्वर में स्थित उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाओं के पास पहुँच गई । ड्राइवर ने गाड़ी को पार्क किया और हम लोग टहलते हुए गुफाओं के पास पहुँच गए । बच्चों ने प्रवेश द्वार पर टिकट लिया और हम सब गुफाओं को देखने पहुँचे । सम्राट अशोक के शासनकाल अर्थात् ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में बनायी गयी, उदयगिरि की गुफाएं लगभग 135 फ़ीट और खंडगिरि की गुफाएं लगभग 118 फ़ीट ऊँची हैं ।

उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएं… भुवनेश्वर, उड़ीसा में
उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएं… भुवनेश्वर, उड़ीसा में

ऊपर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया गया है । मैंने अपने जीवन में पहली बार नज़दीक से और प्रत्यक्ष रूप से इन प्राचीन आवासों को देखा । जितनी कुशलता और सुन्दरता से इन आवासों का निर्माण किया गया है उसे देखकर तत्कालीन समय की शिल्पकला का ज्ञान होता है । भुवनेश्वर शहर में ही रेलवे स्टेशन से मात्र 7-8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उदयगिरि में 18 तथा खंडगिरि में 15 गुफाएं हैं । मैंने देखा कि गुफाओं का निर्माण इतनी कुशलता से किया गया है कि सूर्य की रोशनी अंदर तक पहुँच जाती है जिससे गुफाओं में पूरी तरह से उजाला रहता है । इन गुफाओं में बरामदा और आँगन भी बना हुआ है । यहीं प्रसिद्ध रानी गुम्फा है जो दो मंजिला है ।

उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएं… भुवनेश्वर, उड़ीसा में
उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएं… भुवनेश्वर, उड़ीसा में

जिस हाथी गुम्फा को हम लोग पुस्तकों में पढ़ते थे उसे आज हमने नज़दीक से देखा । इसके प्रवेश द्वार पर बहुत ही सुन्दर छह हाथियों की मूर्तियाँ हैं । यहाँ पर एक शिलालेख भी है जो ऐतिहासिक महत्व का है । अन्य गुफाओं में जय- विजय गुम्फा, पनासा गुम्फा, ठकुरानी गुम्फा, पातालपुरी गुम्फा बहुत प्रसिद्ध हैं । यहाँ पर एक चैत्य भी है जो शायद किसी पवित्र भिक्षु का होगा । इन गुफाओं की खोज पहली बार 19 वीं शताब्दी में एक ब्रिटिश अधिकारी एंड्रयू स्टर्लिंग ने किया था । यहाँ पर लगभग एक घंटे तक व्यतीत करने के बाद हम लोग गुफाओं से नीचे उतरे और बच्चों ने ताजे नारियल का पानी पिया, फ़ोटोग्राफ़ी किया । चूँकि 3 बजे की भुवनेश्वर एयरपोर्ट से हमारी दिल्ली जाने की फ्लाइट थी इसलिए बिना देर किए यहाँ से निकलकर हमने एयरपोर्ट की राह पकड़ी और लगभग 12 बजकर 30 मिनट पर हम बीजू पटनायक अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट, भुवनेश्वर, उड़ीसा पहुँच गए ।

उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएं… भुवनेश्वर, उड़ीसा में
उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएं… भुवनेश्वर, उड़ीसा में

बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर… यद्यपि विगत कई वर्षों से बच्चों को हवाई सफ़र करने के दौरान उन्हें एयरपोर्ट पर लाने और छोड़ने के लिए एयरपोर्ट पर जाना और आना होता रहा है लेकिन यह पहला मौक़ा था जब मुझे पत्नी और बच्चों के साथ हवाई यात्रा करने का अवसर मिला । जीवन के पॉंच दशक बाद, अपने जीवन की पहली हवाई यात्रा के लिए जब मैंने एयरपोर्ट में चेक इन किया तब अचानक गॉंव की गलियों से एयरपोर्ट तक का जीवन का सफ़रनामा दिमाग़ में आ गया । बचपन में, गॉंव में, हम बच्चे आसमान में उड़ते किसी भी हवाई जहाज़ को देखने के लिए दौड़ पड़ते थे और उसे तब तक देखते रहते थे जब तक कि वह ऑंखों से ओझल नहीं हो जाता था । आसमान में उड़ता हुआ हवाई जहाज़ वास्तव में इतना बड़ा होता है यह देखकर बड़ा ताज्जुब हुआ क्योंकि आसमान में तो यह पतंग जैसा दिखता था ।

एयरपोर्ट के लाउंज में
बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर

आज बेहतरीन तालीम और उसे हासिल करने में किए गए त्याग में मिलने वाले कष्टों के आनंद का अनुभव हुआ । इस बात की भी तस्दीक हुई कि जिसने अपने जीवन में कष्ट, दु:ख और दर्द नहीं झेले वह वास्तविक आनन्द, सुख और ख़ुशी की अनुभूति नहीं कर सकता है । स्वतन्त्रता का असली अर्थ केवल वही बता सकता है जिसने कभी बंदी जीवन जिया हो । घनी अँधेरी रात के बाद ही दिन के उजाले का महत्व होता है । ठीक यही बात जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख और दुख, मुफलिसी और अमीरी पर भी लागू होती है । आज मैं जब हवाई जहाज़ के केबिन में प्रवेश कर रहा था तब यह भी बरबस याद आ गया कि अभी कितने ऐसे लोग भी हैं जो आज भी आसमान में उड़ते हुए हवाई जहाज़ को देखते हुए ही जीवन गुजार देते हैं और उन्हें कभी भी यहाँ तक पहुँचने का अवसर नहीं मिलता । बहरहाल हमारी एयर इंडिया की फ्लाइट लगभग तीन घंटे की देरी से सायं सात बजे के क़रीब भुवनेश्वर से दिल्ली के लिए रवाना हुई ।

लेकिन इस दौरान बच्चों ने हम दोनों यानी पति और पत्नी को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होने दिया । एयरपोर्ट पर मिलने वाली सुविधाओं जैसे लाउंज और स्वादिष्ट खाने का पूरा इंतज़ाम उन लोगों ने किया । मैम ने तो बेटी के साथ जाकर एयरपोर्ट के अंदर ही कुछ ख़रीदारी भी किया । यद्यपि यहाँ सामान का रेट बाहर की अपेक्षा ज़्यादा मंहगा होता है बावजूद इसके बेटी ने अपनी मॉम को अमीर होने का एहसास कराया । दो घंटे दस मिनट की यात्रा के बाद लगभग 9 बजकर 15 मिनट के आसपास हमारी फ्लाइट नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर पहुँच गयी । भुवनेश्वर की तुलना में नई दिल्ली में सर्दी काफ़ी अधिक थी । बच्चों ने फटाफट कैब बुक किया और हम रात 11 बजे गुड़गांव स्थित बेटी के आवास पर पहुँच गये । रात के भोजन में खिचड़ी लिया गया और सभी लोग सो गये ।

बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा को भुवनेश्वर एयरपोर्ट के नाम से भी जाना जाता है । उड़ीसा राज्य में स्थित यह एयरपोर्ट यहाँ का मुख्य हवाई अड्डा है । इसका नाम राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के नाम पर रखा गया है । ज्ञातव्य है कि बीजू पटनायक खुद भी एक पायलट थे । समुद्र तल से क़रीब 138 फ़ीट यानी 42 मीटर ऊँचाई पर स्थित इस एयरपोर्ट की उड़ान पट्टी की लंबाई 7300 फ़ीट है ।आज यह भारत का 17 वाँ सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है । 17 जुलाई, 1962 से प्रारम्भ किए गए इस हवाई अड्डे का प्रबंधन भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण द्वारा किया जाता है । यहाँ पर दो टर्मिनल हैं । चूँकि उड़ीसा अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति और विरासत के लिए जाना जाता है इसलिए यहाँ की दीवारों पर उसका शिल्पांकन किया गया है । एयरपोर्ट के पास यात्रियों के ठहरने के लिए सुसज्जित और सुविधाजनक होटल की सुविधा उपलब्ध है । यहाँ से नई दिल्ली, गोवा, इंदौर, बैंगलोर, बड़ोदरा और हैदराबाद जैसे शहरों के लिए हवाई उड़ानें उपलब्ध हैं ।

हरियाणा के शहर गुड़गांव में… दिनांक :31-12-2025 इस वर्ष का आख़िरी दिन बच्चों और परिवार के साथ हरियाणा के हाईटेक शहर गुड़गांव में बीता । चूँकि कल देर रात सोए थे और कई दिनों की थकान थी इसलिए आज सुबह देर से जगे । सुबह की चाय के बाद हल्के मॉर्निंग वॉक पर निकले ताकि घूमने के साथ ही शहर का भी दीदार करूँ । राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली से सटा हुआ और 1950 के दशक तक एक छोटे से गाँव के रूप में आबाद गुड़गांव आज आई टी हब के लिए जाना जाता है । 1 नवम्बर, 1966 को हरियाणा राज्य के गठन के समय ही एक ज़िले के रूप में अस्तित्व में आया गुड़गांव आज गुरुग्राम के नाम से गगनचुंबी इमारतों और अमीरों का रिहायशी इलाक़ा है । हरियाणा सरकार ने वर्ष 2016 में इसका नाम बदलकर गुरुग्राम कर दिया है । दिल्ली से दक्षिण- पश्चिम 32 किलोमीटर दूर स्थित हरियाणा का यह दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला नगर है ।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक़ यहाँ की आबादी लगभग 9 लाख है । चंडीगढ़ और मुम्बई के बाद यह भारत का तीसरा सबसे ज़्यादा पर- कैपिटा इनकम वाला नगर है । नई दिल्ली का इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट गुड़गांव से लगभग जुड़ा हुआ है । गुरुग्राम आज देश में कारपोरेट कम्पनियों, विश्वस्तरीय इन्फ़्रास्ट्रक्चर और अन्य कई वजहों से दुनिया भर में जाना जाता है । एक सर्वे के मुताबिक़ इस शहर ने क्वालिटी ऑफ लाइफ़ इंडेक्स में प्रमुख एशियाई शहरों सिंगापुर, हांगकांग और कुआलालम्पुर को पीछे छोड़ दिया है । आज गुरुग्राम में देश- विदेश की सैकड़ों नामी गिरामी कम्पनियों के कार्यालय हैं । मैट्रो, रैपिड रेल, एक्सप्रेसवे और ग्लोबल स्कूलों ने इसे भविष्य की स्मार्ट सिटी की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है । आज का मेरा पूरा दिन गुरुग्राम के नाम रहा । चूँकि कल यहीं से किताबें लेकर लखनऊ जाना था इसलिए झाँसी से राजा को गाड़ी (इनोवा क्रिस्टा) के साथ यहीं पर बुलाया गया था और वह दोपहर बाद क़रीब 4 बजे गुड़गांव पहुँच गए । राजा रात्रि में यहीं पर साथ में ही रुके ।

गुरुग्राम से लखनऊ वाया यमुना व आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे… दिनांक : 01 जनवरी, 2026 – वर्ष 2026 का मेरा पहला दिन देश के एक्सप्रेसवे हाइवे के नाम रहा । आज की रात और दिन दोनों खूब सर्द था । दोपहर लगभग 2 बजे गुड़गांव में बेटी के आवास पर किताबों की डिलीवरी मिली और तुरंत उसे गाड़ी में सुव्यवस्थित तरीक़े से राजा ने रखा । दोपहर का भोजन करने के बाद मैम ने अपना सारा सामान पैक कर गाड़ी में रखवाया और क़रीब 3 बजकर 30 मिनट पर मैम के साथ मैं बेटी से विदा लेकर लखनऊ के लिए बाई रोड निकला । तीव्र गति से चलती हुई हमारी गाड़ी गुड़गांव शहर को पार कर दिल्ली- मुम्बई सुपर फास्ट एक्सप्रेसवे पर आ गई । यद्यपि बाहर आज सर्दी काफ़ी थी लेकिन गाड़ी में अंदर का सामान्य था और हम लोग सर्दी और गर्मी दोनों का आनंद ले रहे थे । हरियाणा के सोहना के पास हमारी गाड़ी ने दिल्ली- मुम्बई एक्सप्रेसवे को छोड़ा और ईस्टर्न पेरीफ़ेरल एक्सप्रेसवे पर आ गई । आगे चलकर हमने ईस्टर्न पेरीफ़ेरल एक्सप्रेसवे को छोड़कर बाईपास रूट लिया और ज़ेवर के पास यमुना एक्सप्रेसवे पर आ गए । यमुना एक्सप्रेसवे पर आने से ठीक पहले दिल्ली- अलीगढ़ हाईवे पर हम लोगों ने शाम की चाय पी और आगे सफ़र शुरू किया ।

दिल्ली- मुम्बई सुपर फास्ट एक्सप्रेसवे : भारतमाला परियोजना के तहत आठ लेन का बन रहा दिल्ली- मुम्बई एक्सप्रेसवे भारत का सबसे बड़ा एक्सप्रेसवे है । भविष्य में इसे 12 लेन तक बढ़ाया जा सकता है । इस एक्सप्रेसवे की आधारशिला 8 मार्च, 2019 को रखी गई थी और इसकी लागत एक लाख करोड़ रुपये आंकी गई थी । दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र को जोड़ने वाले इस एक्सप्रेसवे की कुल लंबाई 1350 किलोमीटर है । यह एक एक्सेस- कन्ट्रोल्ड एक्सप्रेसवे है जो देश की राजधानी दिल्ली को राजस्थान के दौसा, जयपुर, अजमेर, किशनगढ़, कोटा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, मध्यप्रदेश के रतलाम, गुजरात के वड़ोदरा और सूरत शहरों से गुजरते हुए देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई को सीधे जोड़ता है । इस एक्सप्रेसवे का सफ़र आपको यूरोप के किसी एक्सप्रेसवे जैसा गुडफील कराता है । पूरा एक्सप्रेसवे अंडरपास और ओवरपास, साउंड प्रूफ़ दीवारों और एडवांस ट्रेफ़िक मैनेजमेंट सिस्टम से लैस है । दोनों लेनों के बीच में हरित पट्टी विकसित की गई है जिस पर विविध प्रकार के रंगबिरंगे फूलों के पौधे लगाए गए हैं । इस पर वाहनों की अधिकतम गति सीमा 120 किलोमीटर प्रति घंटे दी गई है ।

ईस्टर्न पेरीफ़ेरल एक्सप्रेसवे : झाँसी से गुड़गांव वाया आगरा- मथुरा आने-जाने के लिए मुझे ईस्टर्न पेरीफ़ेरल एक्सप्रेसवे लेना पड़ता है । क्योंकि इससे दिल्ली नहीं जाना पड़ता । मथुरा से लगभग एक घंटे चलने पर सीधे गुड़गांव जाने के लिए पेरीफ़ेरल एक्सप्रेसवे मिल जाता है । इसी पेरीफ़ेरल एक्सप्रेसवे से दिल्ली- मुम्बई सुपर फास्ट एक्सप्रेसवे को भी लिंक किया गया है । इस पेरीफ़ेरल एक्सप्रेसवे को कुंडली- ग़ाज़ियाबाद- पलवल एक्सप्रेसवे भी कहते हैं । यह दिल्ली के चारों ओर बना हुआ 135 किलोमीटर लंबा, 6 लेन का स्मार्ट और सिग्नल फ्री हाईवे है जो दिल्ली से न गुज़रने वाले यातायात को शहर के बाहर से निकालने के लिए बनाया गया है । 2018 में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस एक्सप्रेसवे को राष्ट्र को समर्पित किया था । यह ग़ाज़ियाबाद, फरीदाबाद, पलवल, सोनीपत, बागपत और ग्रेटर नोएडा को जोड़ता है ।

यमुना एक्सप्रेसवे : आगरा से दिल्ली तक की यात्रा करने वाले यात्री अधिकतर यमुना एक्सप्रेसवे को लेना पसंद करते हैं । यह ग्रेटर नोएडा के परी चौक से प्रारम्भ होकर आगरा शहर को जोड़ता है । 6 लेन के इस एक्सप्रेसवे की लंबाई 165.5 किलोमीटर है जिसे भविष्य में 8 लेन तक बढ़ाया जा सकता है । पीपीपी मॉडल पर बनी इस सड़क का उद्घाटन 9 अगस्त, 2012 को किया गया था । इसका निर्माण कार्य बहुत ही उत्कृष्ट है । रास्ते में पेट्रोल पम्प और नाश्ते तथा भोजन की सुविधा उपलब्ध है । इस सड़क पर गाड़ियाँ बहुत तेज गति से चलती हैं । इस बात का एहसास तब होता है जब किसी स्थान पर आप खड़े होते हैं और गाड़ियों की रफ़्तार को देखते हैं ।

आगरा- लखनऊ एक्सप्रेसवे : यमुना एक्सप्रेसवे को आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे से जोड़ दिया गया है । इसका फ़ायदा यह हुआ है कि लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से सीधे लखनऊ जाने वाले यात्रियों को अब कहीं भी एक्सप्रेसवे से नीचे नहीं उतरना पड़ता । 302 किलोमीटर लम्बा आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे 6 लेन का बनाया गया है । दोनों लेन के बीच में ग्रीन बेल्ट भी है और दोनों किनारों को लोहे की जालियों तथा एल्युमीनियम की लम्बी प्लेटों से कवर्ड किया गया है ताकि कोई भी बाहरी व्यक्ति या जंगली जानवर सड़क पर न आने पाए । यद्यपि अभी यह 6 लेन का है लेकिन भविष्य में इसे 8 लेन तक बढ़ाया जा सकता है । यह एक्सप्रेसवे हाईवे आगरा के इनर रिंग रोड से शुरू होकर फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर नगर, हरदोई, उन्नाव होते हुए लखनऊ तक जाता है । पूरे एक्सप्रेसवे हाईवे पर दो स्थानों पर रेस्ट हाउस बनाया गया है जिसमें वॉशरूम से लेकर भोजन तक की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं । प्राकृतिक रूप से यह एक्सप्रेसवे गंगा, यमुना, इसान, सई और कल्याणी जैसी प्रमुख नदियों को पार करता है । दिल्ली से लखनऊ आने-जाने वाले लोगों के लिए यह एक्सप्रेसवे बहुत मुफीद है । इससे समय की बचत होती है । रात लगभग 9 बजे हम लोगों ने इसी एक्सप्रेसवे पर निर्मित एक रेस्टोरेंट पर रात का खाना खाया और देर रात क़रीब साढ़े ग्यारह बजे लखनऊ पहुँच गए । मेरे एक अभिन्न मित्र और शुभचिंतक डॉ. रमेश शुक्ला ने स्कूटर इंडिया चौराहे के निकट, बिजनौर रोड पर सरोजनी नगर स्थित होटल एसएस ग्रैंड में रुकने के लिए दो कमरे बुक करा दिए थे । रात्रि विश्राम यहीं पर किया ।

जन्मदिन एवं पुस्तक विमोचन समारोह में भागीदारी : दिनांक 2 जनवरी को उत्तर- प्रदेश सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री और वर्तमान समय में अपनी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय श्री स्वामी प्रसाद मौर्य का जन्मदिन हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । उनके चाहने वाले इस दिन को सेवा दिवस के रूप में भी मनाते हैं । बड़े पैमाने पर लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में रक्तदान करते हैं और ग़रीबों को कम्बल व अन्य वस्त्र वितरित किये जाते हैं । इस वर्ष भी इसी तरह का कार्यक्रम आयोजित किया गया । उत्तर प्रदेश के जिला मुख्यालयों पर भी स्वामी प्रसाद मौर्य के अनुयायियों द्वारा जनहितकारी कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है । इस बार इसी सुअवसर पर स्वामी प्रसाद मौर्य के जीवन संघर्षों पर आधारित पुस्तक स्वामी प्रसाद मौर्य के सामाजिक सरोकार का विमोचन भी किया गया । दुसाध प्रकाशन, लखनऊ के द्वारा प्रकाशित लगभग 390 पेज की यह पुस्तक उनके जीवन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालती है । पुस्तक का लेखन और संपादन डॉ. राजबहादुर मौर्य के द्वारा किया गया है ।
चूँकि किताब को समय से पहुँचाने की ज़िम्मेदारी मेरी थी इसलिए मैं अपनी पत्नी के साथ प्रातःकाल 9 बजे उनके गोमतीनगर स्थित आवास पर पहुँच गया और पूरा दिन वहीं रहकर सारे कार्यक्रमों का साक्षी बना । सभी कार्यक्रम निबटाते हुए मुझे शाम के साढ़े छह बज गए। अब बारी थी वापस झाँसी आने की । राजा ने गाड़ी की स्टीयरिंग सँभाली और वापस गोमतीनगर से झाँसी के लिए निकल पड़े । देखते ही देखते गाड़ी लखनऊ के शहीद पथ पर आ गई । शाम के सात बज रहे थे और पूरा लखनऊ शाम की रंग बिरंगी रोशनी में जगमगा रहा था । वाक़ई अपना नवाबी शहर लखनऊ बहुत ख़ूबसूरत है । शहीद पथ से चलते हुए हम लखनऊ- कानपुर हाईवे पर आ गए । यहीं शहर के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक होटल में रात्रि का भोजन किया गया । अब तक रात के क़रीब 9 बज चुके थे ।

पुस्तक विमोचन समारोह लखनऊ में
पुस्तक विमोचन समारोह लखनऊ में
पुस्तक विमोचन समारोह लखनऊ में

लखनऊ से झाँसी : जैसे ही हम लोग लखनऊ पार कर शहर के बाहर निकले वैसे ही रात कुहासे में डूब चुकी थी । सामने कुछ नज़र नहीं आ रहा था । सड़क पर चलने वाली गाड़ियों की रफ़्तार धीमी हो गयी थी । राजा गाड़ी को सम्भाल कर इस उम्मीद में चला रहे थे कि आगे चलने पर कुहरा नहीं मिलेगा । लेकिन कुहरे ने कालपी तक साथ नहीं छोड़ा । जैसे ही हमारी गाड़ी ने यमुना नदी को पार किया और हम बुंदेलखंड की सीमा में पहुँचे वैसे ही रात का मौसम एकदम साफ़ और कुहरा से मुक्त हो गया । हम लोगों ने राहत की साँस ली और गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ी । उरई के टोल प्लाजा को पार कर हमने और राजा ने रात के लगभग 2 बजे चाय पिया । मैम बीच की सीट पर सो रही थीं । दिनांक 3 जनवरी, 2026 को क़रीब चार बजे सुबह में हम लोग झाँसी स्थित अपने आवास पर आ गए । राजा को विदा कर हल्के- फुलके आराम के लिए बिस्तर लिया । जब नींद खुली तो प्रातःकाल के 8 बज गए थे । मैंने कैटल में पानी गर्म किया और ब्लैक टी बनाई । मैम को जगाया, उनके साथ बैठकर ब्लैक टी पिया और दैनिक दिनचर्या में व्यस्त हो गया ।

उपसंहार : बेटी इंजीनियर सपना मौर्या और पारिवारिक सदस्य सौरभ भाई के सौजन्य से दिनांक 25-12-2025 से लेकर दिनांक 03-01-2026 तक की 10 दिवसीय यात्रा मैम के साथ मैने हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न की । इस यात्रा का सारा आर्थिक भार, ट्रेन का सेकेंड एसी का टिकट, अच्छे होटलों में ठहरना, हवाई जहाज़ की यात्रा, एयरपोर्ट पर लाउंज की सुविधा और भी सभी सुविधाओं का खर्च बेटी और सौरभ ने मिलकर उठाया ।
आने- जाने, जगह- जगह होटलों में रुकने, कैब से घूमने की सारी प्लानिंग इन्हीं बच्चों ने की । अब कौन सा ऐसा शब्द है जिसका प्रयोग कर उनके इस एहसान से मुक्त हुआ जा सकता है ? हम पति और पत्नी की दुआ है कि आप लोगों का जीवन मंगलमय हो… ख़ुशियों से दामन भरा रहे … हमेशा रब की रहमत और इनायत रहे..! सचमुच आप लोगों ने बेटे और बेटी होने का फ़र्ज़ अदा किया… हम लोगों की तरफ़ से आप लोगों को अशेष प्यार और आशीर्वाद..!

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Dr. Raj Bahadur Mourya: