डॉ. राजबहादुर मौर्य, असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, बुंदेलखंड कॉलेज झाँसी, उत्तर- प्रदेश (भारत) email: drrajbahadurmourya@gmail.com, website : themahamaya.com
शैक्षणिक भ्रमण और उसका महत्व : सामान्य बोलचाल की भाषा में शैक्षणिक यात्रा वह यात्रा होती है जिसमें छात्र- छात्राओं के एक समूह द्वारा अकादमिक व्यावहारिक ज्ञान के लिए किसी विशेष स्थान का भ्रमण किया जाता है । शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों के बहुमुखी ज्ञान के आयाम प्रदान करता है । इससे विद्यार्थी अधिक सक्रिय भागीदारी के साथ नई- नई चीज़ें सीखते हैं और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं । शैक्षणिक भ्रमण से मिलने वाले अनुभव से छात्र और शिक्षक दोनों अपने ज्ञान के दायरे का विस्तार करते हैं । यात्रा के दौरान एक-दूसरे के प्रति लगाव बढ़ता है और सहयोग की भावना बढ़ती है । दूसरे को खाना खिलाना, दूसरों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना, दूसरों की किसी भी समस्या को तत्काल हल करना, सभी के प्रति सम्मानजनक व्यवहार करना, अपने किसी काम से दूसरे को कष्ट न पहुंचाना हम शैक्षणिक भ्रमण के माध्यम से सीखते हैं । इसके अतिरिक्त शैक्षणिक भ्रमण शिक्षक और छात्र दोनों के लिए प्रामाणिक और सार्थक मूल्यांकन का भी अवसर प्रदान करता है ।
कल तक जिसे हम किताबों में पढ़कर जानते थे उसे शैक्षणिक भ्रमण में प्रत्यक्ष अवलोकन करने का मौक़ा मिलता है । शैक्षणिक भ्रमण के दौरान ही विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता का विकास होता है और उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है जो भविष्य में बेहतर निर्णय लेने में सहायक सिद्ध होता है । शैक्षणिक भ्रमण से ही नए- नए सम्बन्धों को विकसित करने तथा अपने नेटवर्क को मज़बूत बनाने का मौक़ा मिलता है । समाज में आ रहे बदलावों तथा समाज की समस्याओं को भी समझने का अवसर यात्राओं के ज़रिए ही मिलता है । यात्राएँ सामाजिक बुराइयों को दूर कर न्याय और समानता को बढ़ावा देती हैं ।
अन्ततः शैक्षणिक यात्राएँ बेहद मजेदार होती हैं जो जीवन के यादगार पलों को बनाती हैं । घर छोड़कर नई यात्रा पर निकलने का रोमांच अपने आप में अविस्मरणीय होता है । देश- दुनिया घूमना, नए नज़ारे देखना, नई चीज़ें सीखना, अपने कार्यक्रम का प्रबंधन करना, अपरिचित वातावरण में निर्णय लेना और खुद को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करना जीवन के एक अलग अध्याय का सृजन करता है । ज्ञान और विवेक की अभिवृद्धि, व्यक्तित्व विकास, आत्मनिर्भरता, मानवीय मूल्यों का विकास, बेहतर स्वास्थ्य और ज़िम्मेदार नागरिकता ही व्यक्तिगत और राष्ट्रीय प्रगति की कुंजी है ।
शैक्षणिक भ्रमण की पृष्ठभूमि : भारत सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत शैक्षणिक भ्रमण को बढ़ावा दिया है । परास्नातक स्तर पर पाठ्यक्रम में शैक्षणिक भ्रमण को भी शामिल किया गया है । इसी चीज़ को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक भ्रमण को प्रोत्साहित किया जा रहा है । बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी के अंतर्गत आने वाले बुंदेलखंड महाविद्यालय झाँसी के विभिन्न विभागों में भी नियमित रूप से शैक्षणिक भ्रमण सम्पन्न कराया जाता है । राजनीति विज्ञान विभाग, बुंदेलखंड कालेज, झाँसी भी निरंतर इस गुरूतर दायित्व का निर्वहन करता रहता है । इसी कड़ी में दिनांक 30 जनवरी, 2026 को एम ए. राजनीति विज्ञान, चतुर्थ सेमेस्टर के 33 सदस्यीय दल ने ग्वालियर, फतेहपुर सीकरी और आगरा की एक दिवसीय यात्रा सम्पन्न की । यात्रा के संयोजक बुंदेलखंड कालेज, झाँसी के राजनीति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और एम. ए. के प्रभारी प्रोफेसर डॉ. शिवकुमार यादव थे । विभाग के अन्य प्राध्यापक, विभाग प्रभारी डॉ. राजबहादुर मौर्य और स्नातक तृतीय वर्ष के प्रभारी प्राध्यापक डॉ. नागेंद्र कुमार सिंह भी यात्रा में शामिल थे । इस पूरी यात्रा को सम्पन्न कराने में बुंदेलखंड कालेज झाँसी के प्राचार्य प्रोफ़ेसर एस के राय का योगदान सबसे अहम रहा जिन्होंने न केवल सहर्ष यात्रा की अनुमति प्रदान की बल्कि आर्थिक सहयोग भी प्रदान किया ।
यात्रा में शामिल मुसाफ़िर : डॉ. राजबहादुर मौर्य, विभाग प्रभारी, डॉ. शिवकुमार यादव, यात्रा संयोजक और एम.ए. प्रभारी, डॉ. नागेंद्र कुमार सिंह, प्रभारी स्नातक तृतीय वर्ष (सभी प्राध्यापक)। छात्र एवं छात्राएँ : सुरेन्द्र सिंह यादव, कृष्णा कुशवाहा, धर्मेंद्र कुमार, राहुल कुमार, धीरेन्द्र कुमार, विक्रम सिंह चौधरी, मंगल सिंह, हर्षवर्धन सोनी, अभिषेक राजपूत, प्रियांशु यादव, लव यादव, मानवदीप कुशवाहा, अमित कुमार, देवनिधि बाजपेयी, रक्षा राय, मधु रायकवार, वंदना शाक्य, शिखा वर्मा, ज्योति कुशवाहा, प्रियंका वर्मा, राधा भार्गव, दिव्या साहू, स्तुति खरे, हिमाद्रि गुप्ता, जया श्रीवास्तव, हर्षित गुर्जर, आशीष वर्मा, चंचल पुरोहित । इसके अतिरिक्त गाड़ियों के ड्राइवर राजा और सोनू भाई ।
यात्रा की तैयारी : वर्ष 2025-26 की तृतीय सेमेस्टर की वार्षिक परीक्षा सम्पन्न होते ही विद्यार्थियों ने शैक्षणिक भ्रमण के बारे में चर्चा और परिचर्चा करना शुरू कर दिया था । एम ए तृतीय सेमेस्टर के छात्र धर्मेंद्र कुमार, मानवदीप कुशवाहा, मंगल सिंह, विक्रम सिंह तथा हर्ष वर्धन व छात्राओं में शिखा वर्मा, स्तुति खरे, जया श्रीवास्तव तथा राधा भार्गव ने लगभग प्रतिदिन कालेज में विभाग में आकर यात्रा के स्वरूप को आकार देते रहे । इसी बीच बच्चों की इच्छाओं तथा शैक्षणिक ज़रूरतों को देखते हुए राजनीति विज्ञान विभाग के सभी प्राध्यापकों की एक बैठक सम्पन्न हुई जिसमें शैक्षणिक यात्रा को लेकर सहमति बनी । विभाग में बनी इस सहमति से सभी विभागीय प्राध्यापकों ने जाकर कालेज के प्राचार्य जी को अवगत कराया । प्राचार्य जी ने कुछ ज़रूरी काग़ज़ात पूरा करने के निर्देश देते हुए शैक्षणिक यात्रा को अपनी सहमति दे दी और साथ ही कुछ आर्थिक सहायता प्रदान करने का भी आश्वासन दिया । प्राचार्य जी की सहर्ष सहमति मिलते ही छात्रों के मन में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी । चूँकि पिछले वर्ष विभाग की शैक्षणिक यात्रा गढकुंडार और ओरछा तक गयी थी इसलिए इस बार यात्रा के रूट को थोड़ा लम्बा करने का निर्णय लिया गया । यह तय किया गया कि यात्रा कम से कम चार सौ किलोमीटर के आसपास की जाए । छात्र एवं छात्राओं की ओर से यात्रा को विश्व विरासत स्थल और बुंदेलखंड के प्रमुख पर्यटन स्थल खजुराहो तक ले जाने का सुझाव दिया गया और इस पर लगभग मोटा- मोटी सहमति भी बन गयी ।
परन्तु कालेज के कुछ प्राध्यापकों और कुछ शोध छात्रों की ओर से खजुराहो जाने के औचित्य को प्रश्नांकित किया गया । इस पर विचार- विमर्श करने के लिए सभी विद्यार्थियों के साथ पुनः बैठक की गयी और वस्तुस्थिति की जानकारी दी गयी । बैठक में लम्बे विचार- विमर्श के बाद खजुराहो जाने का निर्णय स्थगित कर दिया गया और नए डेस्टिनेशन पर विचार किया गया । चूँकि झाँसी से 200 किलोमीटर की रेंज में मध्यप्रदेश का सागर, उत्तर प्रदेश का कानपुर और आगरा शहर आते हैं इसलिए बहुमत की राय यह थी कि आगरा की यात्रा की जाए । छात्रा राधा भार्गव ने इस सुझाव पर आंशिक संशोधन करते हुए यात्रा को फतेहपुर सीकरी के बुलंद दरवाज़े तक ले चलने की इच्छा व्यक्त की जिसे सभी लोगों ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया । छात्र कृष्णा कुशवाहा ने शैक्षणिक यात्रा को नई दिल्ली तक ले चलने का अनुरोध किया लेकिन उस पर बात नहीं बनी क्योंकि उसमें खर्च और समय दोनों अधिक लग रहा था । एक छात्रा ने मध्यप्रदेश के शहर जबलपुर जाने की बात कही लेकिन उस पर भी आगे बात नहीं बढ़ी । बैठक में यह बात भी तय की गयी कि छात्र एवं छात्राओं से कुछ ग्रुप सहयोग कर लिया जाए । इसके लिए छात्रों में धर्मेन्द्र और छात्राओं में राधा भार्गव को अधिकृत किया गया । बच्चों ने बैठक में लिए गए निर्णयों से विभाग के सभी प्राध्यापकों को अवगत कराया और एम ए के प्रभारी प्राध्यापक डॉ. शिवकुमार यादव को इस यात्रा का संयोजक बनाया गया । डॉ. शिवकुमार यादव ने धर्मेंद्र कुमार को सभी तैयारियों के लिए अधिकृत किया और उन्हें सहयोग करने के लिए स्तुति खरे तथा शिखा वर्मा को नियुक्त किया ।
धर्मेंद्र कुमार, स्तुति खरे, शिखा वर्मा, मानवदीप कुशवाहा और हर्षवर्धन ने मिलकर परिश्रम पूर्वक सारी तैयारियों को अंजाम तक पहुंचाया । यात्रा में शामिल होने वाले सभी लोगों की सूची तैयार की गई । उनके आधार कार्ड तथा कालेज की फ़ोटो आई डी इकट्ठा की गयी । जिन छात्रों का परिचय पत्र तैयार नहीं था उन्हें तैयार कराया गया । सभी शिक्षकों ने भी अपने- अपने परिचय पत्र दिए । इन सभी की छायाप्रति तैयार कर एक लगभग 40 पेज की फ़ाइल दो प्रतियों में बनाई गयी । सभी शिक्षकों और छात्रों के हस्ताक्षर भी लिए गए । धर्मेंद्र और कृष्णा कुशवाहा ने मिलकर यात्रा का सुंदर बैनर तैयार कराया । हर्षवर्धन ने यात्रा के लिए एक सुन्दर आई कार्ड तैयार किया और उसे एक रिबन से जोड़कर गले में पहनने के लिए तैयार किया । इस बीच यात्रा के संयोजक डॉ. शिवकुमार यादव ने विभाग प्रभारी डॉ. राजबहादुर मौर्य के साथ मिलकर कालेज के प्राचार्य जी से यात्रा की अनुमति के लिए एक अनुमति पत्र तथा आर्थिक सहयोग आवेदन पत्र तैयार कराया । प्राचार्य जी से मिलकर यात्रा की अनुमति ली गई और आर्थिक सहायता के लिए निवेदन किया गया । प्राचार्य जी ने दोनों बातें स्वीकार कर लिया । पहले यह तय किया गया था कि यात्रा 27 या 28 जनवरी को रहेगी लेकिन इसी बीच 27, 28 एवं 29 जनवरी को महाविद्यालय के वार्षिक खेलकूद समारोह का आयोजन तय हो गया इसलिए प्राचार्य जी ने कहा कि यात्रा को इसके बाद कर लिया जाए । सभी ने प्राचार्य जी के इस निर्णय पर सहमति जताई और अन्ततः यात्रा की तारीख़ 30 जनवरी तय की गयी ।
मैंने चलने के लिए एक 26 सीटर बस बुक किया और साथ चलने के लिए एक इनोवा कार भी बुक किया । चूँकि यात्रियों की संख्या अधिक थी इसलिए यह तय किया गया कि यदि बैठने की जगह कम पड़ेगी तो डॉ. शिवकुमार जी अपनी क्रेटा गाड़ी भी यात्रा में शामिल करेंगे । 29 तारीख़ तक मेहनत करके धर्मेंद्र, शिखा, स्तुति, राधा, मानवदीप और कृष्णा कुशवाहा ने सभी तैयारियाँ पूरी कर लिया । सभी यात्रियों को डॉ. शिवकुमार जी ने सफ़र के दौरान किए जाने वाले आवश्यक दिशा निर्देश दिए । यह तय किया गया कि यात्रा 30 जनवरी को सुबह 6 बजे झाँसी से प्रारंभ होगी और देर रात वापसी होगी । सभी मुसाफ़िरों को प्रातःकाल 05:30 पर बीकेडी शिक्षक आवास के बाहर, प्राचार्य जी के आवास के क़रीब एकत्र होने के लिए कहा गया । सभी ने एक दूसरे से विदा ली और अपने घर के लिए निकल गए । हर्षोल्लास के माहौल में इस रात शायद ही किसी को ठीक से नींद आई । मैं तो पूरी रात जगता ही रहा और लगभग यही हाल डॉ. नागेंद्र कुमार सिंह का भी था जिन्होंने मुझे अगले दिन जानकारी दी ।
यात्रा का प्रारम्भ : दिनांक 30 जनवरी 2026 की सुबह बहुत सर्द थी । खूब घना कोहरा छाया था लेकिन सामूहिक यात्रा का जोश और उमंग इस मौसम को मात दे रहा था । डॉ. नागेंद्र सिंह जी तो क़रीब 5 बजे ही मेरे आवास पर आ गए जबकि मैं अभी तैयार नहीं हुआ था । इसके साथ ही राहुल सोनी, शिखा वर्मा, धर्मेंद्र और स्तुति खरे भी आ गई । देखते ही देखते 15 मिनट के अंदर लगभग सभी लोग आ गए । मैंने राजा को फ़ोन किया और तत्काल गाड़ी लेकर पहुँचने का निर्देश दिया । फ़ोन करने के लगभग 5 मिनट बाद ही दोनों गाड़ियाँ आ गयीं । सभी बच्चों के बैग बस की डिक्की में रख दिए गए और ज़रूरी बैग हाथ में लिये गए । लगभग 6 बजे डॉ. शिवकुमार जी भी अपनी गाड़ी लेकर आ गए ।
बच्चों ने सुव्यवस्थित तरीक़े से सभी का सामान रखवाया । धर्मेंद्र ने बैनर निकालकर सभी के साथ सामूहिक फ़ोटोग्राफ़ी की । डॉ. शिवकुमार जी ने यात्रा को रवाना करने के लिए प्राचार्य जी को सोते हुए जगाया और उनसे अनुरोध किया कि वह हमारी शैक्षणिक यात्रा को आशीर्वाद प्रदान कर हरी झंडी दिखाकर रवाना करने की कृपा करें । प्राचार्य जी हम सबको निराश नहीं किया और कड़ाके की सर्दी के बावजूद वह अपना आशीर्वाद प्रदान करने के लिए बच्चों के बीच उपस्थित हुए । उन्होंने यात्रा की शुभकामनाएँ दी और हरी झंडी दिखाकर यात्रा को रवाना किया । प्राचार्य जी से आशीर्वाद प्राप्त कर हमारी गाड़ी को चालक सोनू भाई ने आगे बढ़ाया और मोड़कर ग्वालियर रोड पर आ गए ।
बीकेडी चौराहे से आगरा तक जाने के लिए हमें राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-44 लेना होता है । ज़बरदस्त कुहासे के बीच चलती हुई हमारी गाड़ी ने आहिस्ता- आहिस्ता झाँसी शहर को पार किया । अभी झाँसी लगभग सुबह के आग़ोश में सोई हुई थी । इक्का दुक्का लोग ही सड़क पर दिखाई दे रहे थे । झाँसी शहर की पाल कालोनी के पास राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 44 की क्रासिंग होती है । इस समय यहाँ पर ओवरब्रिज का काम चल रहा है लेकिन सुबह होने के कारण जाम नहीं था और हमारी गाड़ी इसको आसानी से पार कर आगे बढ़ गई । झाँसी से चलने के बाद हमारा पहला डेस्टिनेशन ग्वालियर से लगभग 15 किलोमीटर पहले पड़ने वाला जौरासी क़स्बा था । यह मध्य प्रदेश में आता है ।
लगभग डेढ़ घंटे के सफ़र के बाद हमारी गाड़ी सिंध नदी को पार कर जौरासी पहुँच गयी । सिंध नदी मध्य प्रदेश की एक प्रमुख नदी है जो विदिशा ज़िले से निकलकर गुना, अशोक नगर, शिवपुरी, दतिया, ग्वालियर और भिंड ज़िलों से बहती हुई अन्ततः उत्तर प्रदेश के जालौन ज़िले में यमुना नदी से मिल जाती है । ग्वालियर के डबरा क़स्बे में पार्वती नदी के साथ इसका संगम होता है । यहाँ धूमेश्वर धाम एक प्रमुख तीर्थ स्थल है । यह नदी लगभग 470 किलोमीटर की दूरी तय करती है । इसका प्रवाह उत्तर- पूर्व दिशा में है । मैंने यहाँ पर बच्चों को मालवा के पठार से निकलकर आने वाली इस सिंध नदी के बारे में जानकारी दी । यहाँ सभी को गरमागरम चाय और गरमागरम पकौड़ी का स्वादिष्ट नाश्ता कराया गया । सभी ने बड़े उत्साह और उल्लास पूर्वक चाय पी और पकौड़ियों का लुत्फ उठाया ।
जौरासी के एक सुप्रसिद्ध मंदिर में : जौरासी में एक प्राचीन हनुमान मन्दिर है जहां भक्तों की काफ़ी भीड़ रहती है । हमारे बच्चों ने भी श्रद्धा पूर्वक मंदिर को नमन् किया और आशीर्वाद प्राप्त किया । जौरासी गाँव में स्थित एक प्राचीन मन्दिर है जो हनुमान जी को समर्पित है । यहाँ पर लगभग 200 वर्ष पुरानी हनुमान जी की प्रतिमा है । यह एक जागृत स्थान माना जाता है । ग्वालियर से झाँसी और झाँसी से ग्वालियर की ओर आने और जाने वाले यात्री यहाँ रुकते हैं और मंदिर में दर्शन करते हैं । इस जौरासी मंदिर में हनुमान जी को चोला चढ़ाने की परम्परा है । इस मंदिर में लोगों की अटूट आस्था का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि आप यहाँ भगवान का श्रृंगार करने के लिए चोला अर्पित करने की आज बुकिंग करते हैं तो आपका नम्बर लगभग 10 साल बाद आएगा और तब तक आपको इंतज़ार करना पड़ेगा । मंदिर के बाहर कुल्हड़ वाली चाय, सूजी की बेडी, गरमागरम स्वादिष्ट पकौड़ी और समोसे के लिए यह जगह काफ़ी मशहूर है । शनिवार और मंगलवार को यहाँ पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है ।
अभी हम लोग नाश्ता कर ही रहे थे कि पीछे से चलने वाली इनोवा कार भी यहाँ पर आ गयी । इनोवा में तीन विद्यार्थियों के साथ डॉ. शिवकुमार जी और डॉ. नागेंद्र सिंह चल रहे थे । मैं बच्चों के साथ बस में था । सभी लोगों ने चाय- नाश्ता कर पुनः अपनी- अपनी जगह ली और गाड़ियाँ अगले मंजिल की ओर चल पड़ीं । कुहासे को चीरती हुई हमारी गाड़ी ने ग्वालियर शहर से पहले पड़ने वाली घाटी को पार किया । यह संकरी सड़क से जुड़ी हुई घाटी दोनों ओर ऊँचे पहाड़ों से घिरी हुई है । कभी इसे पार करना मुश्किल होता था लेकिन आज सरकार के प्रयासों से यहाँ न केवल यातायात सुगम है बल्कि पूरी सुरक्षा भी रहती है । मैंने बच्चों को घाटी दिखाई और यात्रा के दौरान बरती जाने वाली सावधानी के बारे में जागरूक किया । इसे पार करते ही ग्वालियर शहर की सीमा प्रारम्भ हो जाती है । अब आगरा शहर जाने के लिए ग्वालियर शहर नहीं जाना पड़ता बल्कि राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 44 को बाईपास से जोड़ दिया गया है जिससे अनावश्यक जाम की समस्या से छुटकारा मिल गया है । इसी बाईपास से होकर हम लोग आगरा शहर की ओर आगे बढ़े ।
ग्वालियर से आगरा तक राष्ट्रीय राजमार्ग पर वाहनों की काफ़ी भीड़ रहती है जिससे सौ किलोमीटर की यात्रा करने में लगभग दो घंटे का समय लग जाता है । ग्वालियर से आगे चलने पर राजस्थान की सीमा आ जाती है । राजस्थान का प्रसिद्ध शहर धौलपुर इसी रास्ते पर पड़ता है । यहीं रास्ते में चम्बल नदी भी बहती है । चंबल नदी मध्य और उत्तरी भारत में यमुना नदी की सहायक नदी है । चंबल नदी मध्यप्रदेश के इंदौर ज़िले में महू से लगभग 70 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित मांडव के पास विन्ध्य पर्वत माला की उत्तरी ढलानों पर स्थित भडकला जलप्रपात से निकलती है । मध्य प्रदेश और राजस्थान के विशाल क्षेत्रों में बहती हुई यह नदी उत्तर- प्रदेश के जालौन ज़िले में यमुना नदी से मिल जाती है ।
चम्बल नदी लगभग 1000 किलोमीटर से अधिक लंबी दूरी में बहती है । गांधीसागर बाँध, जवाहर सागर बांध और राणा प्रताप बांध इसी नदी पर बने हुए हैं। गॉंधी सागर बांध मध्यप्रदेश के मंदसौर ज़िले में राजस्थान- मध्यप्रदेश सीमा पर स्थित है । इस बांध की आधारशिला पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 7 मार्च, 1954 को रखी थी और 1960 में यह परियोजना पूरी हुई थी । जबकि राणा प्रताप सागर बांध राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले में रावतभाटा के पास बना हुआ है । जवाहर सागर बाँध कोटा शहर से लगभग 30 किलोमीटर ऊपर की ओर बना हुआ है ।इस बांध का निर्माण कार्य 1953 में प्रारम्भ हुआ था और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के द्वारा 1970 में इसे राष्ट्र को समर्पित किया गया । एक प्राध्यापक और गाइड के रूप में मैंने अपने सभी विद्यार्थियों को चंबल नदी और उसकी प्राचीनता के साथ-साथ महत्व और उपयोगिता के बारे में जानकारी दी । चूँकि बुन्देलखण्ड परिक्षेत्र स्वयं भी नदियों के जल पर निर्भर है इसलिए बच्चों को समझने में आसानी हुई ।
राजस्थान सीमा पार कर पुनः उत्तर प्रदेश की सीमा प्रारम्भ हो जाती है । चूँकि हम लोगों को फतेहपुर सीकरी जाना था इसलिए हमने आगरा से पहले पड़ने वाले आगरा बाईपास को लिया । आगरा बाईपास मुख्य रूप से एन एच- 19 (पुराना एन एच-2) और एन एच- 44 (पुराना एन एच- 3) को जोड़ता है जिससे दिल्ली और ग्वालियर आने-जाने वालों को काफ़ी सहूलियत होती है । आगरा बाइपास पर थोड़ी दूर चलने पर गाड़ी सिकरवार फेमिली रेस्टोरेंट में रुकी और वहीं पर सभी लोग रिफ़्रेश हुए और स्वल्पाहार लिया तथा गरमागरम चाय पी गयी । होटल काफ़ी सुसज्जित और खुला- खुला सा था । पास में ही अराध्या पंछी पेठा व दालमोट गजक की दुकान भी थी जहाँ कुछ बच्चों ने पेठा और गजक का भी लुत्फ उठाया ।
अब तक दोपहर के लगभग बारह बज चुके थे । सभी लोग तरोताज़ा होकर अगले सफ़र के लिए निकल पड़े । रैभा टोल प्लाजा से पहले हमारी गाड़ी में बाएँ से नीचे उतरकर जयपुर रोड ले लिया । राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 21 आगरा- फतेहपुर सीकरी सड़क पर लगभग आधे घंटे चलने के बाद हम लोग फतेहपुर सीकरी स्थित बुलंद दरवाज़ा के कम्पाउंड में पहुँच गए । दोनों गाड़ियों को सुव्यवस्थित तरीक़े से पार्किंग में लगाया गया और सभी लोग बाहर निकले । यहाँ पहुँच कर सभी बच्चे बहुत ख़ुश दिख रहे थे । मुझे छोड़कर जितने भी अन्य लोग थे वह सभी पहली बार यहाँ की यात्रा पर आये थे । पार्किंग स्थल से आटो लेकर हम लोग बुलंद दरवाज़े के समीप पहुँचे । वहाँ से चंद कदमों की दूरी सभी ने पैदल चल कर पूरी की ।
बुलंद दरवाज़ा और उसका महत्व : आगरा शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर जयपुर रोड पर फतेहपुर सीकरी नामक स्थान पर स्थित बुलंद दरवाज़ा दुनिया का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार है । इसे शानदार द्वार भी कहा जाता है । 53.63 मीटर(177 फ़ीट ) ऊँचे और 35 मीटर चौड़े इस बुलंद दरवाज़े का निर्माण मुग़ल बादशाह अकबर ने 1601-1602 में गुजरात पर विजय के उपलक्ष्य में करवाया था । लाल बलुआ पत्थर और सफ़ेद तथा काले संगमरमर पत्थर से निर्मित यह स्मारक हिन्दू और फारसी शैली तथा वास्तुकला का अद्भुत मिश्रण है । बुलंद दरवाज़े तक पहुँचने के लिए 42 खड़ी सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं । बुलंद दरवाज़े के पूर्वी मेहराब पर पर अकबर की धार्मिक सहिष्णुता और दक्कन की विजय से सम्बन्धित फ़ारसी शिलालेख हैं जिसमें 1573 में गुजरात में मिली जीत का उल्लेख है । प्रवेश द्वार के चारों ओर छोटे बुर्ज हैं । मुख्य द्वार पर फ़ारसी में लिखा हुआ एक इस्लामी शिलालेख है जिसमें ईसा मसीह का संदेश लिखा हुआ है ।
दरवाज़े के ऊपरी भाग पर क़ुरान की आयतें उकेरी गई हैं । बुलंद दरवाज़े से अंदर प्रवेश करने पर जामा मस्जिद का प्रांगण है जहाँ सूफ़ी संत सलीम चिश्ती (1478-1572) की दरगाह है । जामा मस्जिद और फ़तेहपुर सीकरी के पुराने शहर के साथ, मकबरे को 1986 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है । यहीं पर मुग़ल सम्राट अकबर ने 1575 में सभा भवन बनवाया था जिसमें विभिन्न धार्मिक नेता एकत्रित होकर आपसी संवाद करते थे । बहुत सारे विचार विमर्शों के बाद सन् 1580 के दशक के अंत तक अकबर ने सभी धर्मों के मतभेदों को सुलझाने का प्रयास शुरू किया और एक नए धर्म दीन- ए-इलाही (ईश्वरीय धर्म) की स्थापना की जिसमें इस्लाम के सूफीवाद और हिन्दू धर्म के भक्ति आन्दोलन को समाहित किया गया था । बुलंद दरवाज़े के निर्माण में 12 वर्षों का समय लगा था ।
इसमें लगभग 400 साल पुराने आबनूस से बने विशाल किवाड़ आज भी ज्यों के त्यों लगे हुए हैं । 1571 से 1585 ईसवी तक फतेहपुर सीकरी मुगल साम्राज्य की राजधानी थी । बुलंद दरवाज़ा भारत की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक इतिहास का प्रतीक है । बच्चों ने बड़े उत्साह और उमंग के साथ इस परिसर का भ्रमण किया, इसकी ऐतिहासिकता के बारे में जानकारी हासिल की । लगभग एक घंटे के भ्रमण के बाद हम सभी लोग परिसर से बाहर निकले और पैदल चलते हुए पार्किंग स्थल तक पहुँचे । यहाँ पर रास्ते में बंदरों की अधिकता रहती है इसलिए सावधानी पूर्वक हम लोग वहाँ से निकल कर आगे बढ़े । चूँकि हमारी यात्रा का अगला पड़ाव आगरा था इसलिए बिना देर किए हुए हम लोग आगरा के लिए निकल पड़े ।
आगरा के क़िले का भ्रमण : फतेहपुर सीकरी से आगरा के क़िले तक पहुँचने में लगभग एक घंटे का समय लग गया । आगरा के क़िले के परिसर में पहुँचते- पहुँचते लगभग पौने चार बज गए । शीघ्रता से दोनों गाड़ियों को पार्किंग में खड़ा किया गया और बाहर निकल कर सभी लोग एकत्र हुए । यह तय किया गया कि पहले क़िले का भ्रमण कर लिया जाए और फिर वापस लौट कर चाय पी जाएगी । धर्मेंद्र ने सभी के लिए टिकट ख़रीदा और फ़ोर्ट के अंदर जाने के लिए लगी लाइन में खड़े हो गए । कड़ी सुरक्षा जाँच के बाद हम सभी लोग क़िले के अंदर प्रविष्ट हुए । थोड़ा सा आगे बढ़ने पर पुनः टिकट जाँच की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा । छात्रा राधा भार्गव की टिकिट बैग में छूट गयी थी लेकिन उसकी फ़ोटो मोबाइल पर थी इसलिए थोड़ी तकरार के बाद अन्दर प्रवेश मिला । अन्दर जाकर मैंने एक गाइड साथ ले लिया और उससे कहा कि भाई हम सबको एक घंटे में जितना सम्भव हो उतना दिखा दिया जाए । गाइड अरबाज़ भाई ने सहमति में सर हिलाया और सभी को एकत्रित कर जानकारी देना शुरू किया । लगभग 25 वर्षीय गाइड अरबाज़ भाई की फ़ोर्ट के बारे में जानकारी ग़ज़ब की थी और उसका प्रस्तुतीकरण भी लाजवाब था । धाराप्रवाह हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में उसने हमारी पूरी टीम को क़िले की महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं । उसने बताया कि आगरा के क़िले को लाल क़िला भी कहते हैं ।
राजस्थान से लाए गए लाल बलुआ पत्थरों से इस क़िले का निर्माण किया गया है । भारत के मुग़ल शासक बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगज़ेब यहाँ रहा करते थे और यहीं से पूरे भारत पर शासन करते थे । प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा यहीं पर था । जीवन के अन्तिम दिनों में शाहजहाँ को उसके पुत्र औरंगज़ेब ने बंदी बनाकर इसी क़िले में क़ैद कर रखा था । क़ैद में लगभग सात साल बाद उसकी मृत्यु हुई । क़िले के अन्दर मयूर सिंहासन या तख़्ते हाउस स्थापित था । जहांगीर का काला सिंहासन आज भी मौजूद है । वर्ष 1983 में युनेस्को के द्वारा इस क़िले को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया । वर्तमान समय में इसका कुछ हिस्सा भारतीय सेना के अधीन है और बाक़ी भारतीय पुरातत्त्व विभाग की देखरेख में है । यमुना नदी के तट पर स्थित यह क़िला ताजमहल से लगभग ढाई किलोमीटर दूर है । आगरा कैंट रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 5.5 किलोमीटर है । इसी क़िले के अंदर स्कॉटिश मूल के जॉन रसेल कोल्विन का मक़बरा भी है ।
लगभग एक घंटे के भ्रमण के बाद क़रीब 5 बजे हम लोग क़िले के बाहर आ गए । वापस निकलते समय सभी ने ग्रुप फ़ोटोग्राफ़ी की और वापस परिसर से निकलकर क़िले के सामने लगे खानपान के स्टालों पर आ गये । यात्रा के संयोजक डॉ. शिवकुमार यादव जी ने सभी के लिए स्वादिष्ट चाय और नाश्ते की व्यवस्था की । सभी बच्चों ने अपनी- अपनी पसंद का नाश्ता किया । किसी ने चाय और पेटीज, किसी ने फ़्रूट, किसी ने पाव भाजी, किसी ने बिस्किट, किसी ने कोल्ड ड्रिंक और किसी ने जमकर आइसक्रीम का लुत्फ उठाया । बच्चों ने सेल्फी भी ली । दोनों गाड़ी के ड्राइवरों को भी चाय और नाश्ता कराया गया । क़रीब 6 बजे हम लोग वापस अपनी गाड़ियों में बैठ गए ।
हम सब की और बच्चों की चाहत थी कि लगे हाथ मथुरा की भी यात्रा कर ली जाए और बाँकेबिहारी का आशीर्वाद ले लिया जाए लेकिन मथुरा में रात्रि विश्राम की समुचित व्यवस्था न हो पाने के कारण तथा कुछ आर्थिक कारणों से वहाँ की यात्रा भारी मन से स्थगित करनी पड़ी । छात्रा राधा भार्गव ने कहा कि सर बाँकेबिहारी जी हम लोगों से लगता है कि नाराज़ हैं इसलिए हम लोग वहाँ नहीं जा पा रहे लेकिन हम जल्दी ही दुबारा वहाँ जाएँगे । मैंने सहमति में शिर हिलाया और बाँकेबिहारी जी से क्षमायाचना कर वापस झाँसी की राह पकड़ी । शाम के समय आगरा में काफ़ी भीड़ थी इसलिए वहाँ शहर पार करते करते लगभग रात के 9 बज गए । आगरा शहर को पार कर गाड़ी एक पेट्रोल पंप पर डीज़ल लेने के लिए रुकी और डीज़ल लिया । यहीं पर बच्चे रीफ़्रेश हुए और आगे की यात्रा पर निकले ।
आगरा से ग्वालियर और झाँसी तक की यात्रा : आमतौर पर आगरा से ग्वालियर तक पहुँचने में लगभग दो घंटे का वक़्त लगता है लेकिन आज कुहरा बहुत अधिक था इसलिए सामने की दृश्यता कम थी । परिणामस्वरूप गाड़ी तेज़ रफ़्तार से नहीं चल पा रही थी और ऊपर से भारी ट्रेफ़िक भी थी । इसलिए ग्वालियर तक पहुँचने में लगभग तीन घंटे का वक़्त लग गया । चूँकि रात का भोजन जौरासी में करना था इसलिए हम लोग बिना रुके लगभग रात के साढ़े ग्यारह बजे जौरासी पहुँचे । यहीं पर सभी ने रात का भोजन किया । भोजन सादा था लेकिन स्वादिष्ट था । यद्यपि अब तक रात्रि के 12 बजे से अधिक का समय हो गया था और सभी की पूरे दिन की भरपूर व्यस्तता थी लेकिन मैंने देखा कि किसी के चेहरे पर न तो कोई थकान थी और न ही कोई शिकन । आशा और उल्लास का ऐसा भाव कभी- कभी ही देखने को मिलता है । पिछली रात भी सभी को कम ही नींद आई थी । बावजूद इसके लगता था कि यात्रा बस अभी शुरू ही हुई है ।
यात्रा के संयोजक डॉ. शिवकुमार जी निरंतर छात्रों का मार्गदर्शन और हौसलाअफ़जाई कर रहे थे । पूरी यात्रा उन्होंने कहीं भी उफ़ नहीं किया । बच्चों को खिलाना और सम्भालना कोई भी डॉ. शिवकुमार जी से बखूबी सीख सकता है । डॉ. नागेंद्र सिंह जी की चुटकी लेती हुई बातें सुनकर सभी लोग बरबस मुस्कुरा देते थे । राधा भार्गव और डॉ. नागेंद्र सिंह जी की प्यारी नोकझोंक में सभी को मज़ा आता था । रात लगभग दो बजे हम सभी लोग सकुशल, हर्षोल्लास के साथ-साथ वापस झाँसी आ गए । सभी लोगों ने एक-दूसरे को सफल यात्रा की शुभकामनाएँ दीं और ईश्वर का शुक्रिया अदा किया । सभी लोग अपने- अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गए । मैं भी सबको बिदा कर मायूसी और ख़ामोशी के साथ अपने सरकारी आवास पर वापस लौट आया । मुझे इस बात का मलाल था कि सभी लोगों का साथ इतनी जल्दी क्यों छूटा… लेकिन तभी मुझे परवीन शाकिर का वह शेर याद आया कि : मलाल तो है मगर इतना मलाल थोड़ी है, यह ऑंख रोने की शिद्दत से लाल थोड़ी है । हार कर भी मुस्कुराते रहें, हमेशा जीत जाना ही कमाल थोड़ी है ।।
यात्रा से मिली सीख : प्रातः 6 बजे से लेकर रात 2 बजे तक तक की लगभग 26 घंटे की अविरल यात्रा में हम सभी ने लगभग 550 किलोमीटर की यात्रा पूरी की । देश के तीन राज्यों उत्तर- प्रदेश, मध्य- प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं से होकर हम गुज़रे । झाँसी से निकलकर दतिया, ग्वालियर, भिंड, मुरैना, बानमोर, धौलपुर, फतेहपुर सीकरी और आगरा जैसे शहरों और क़स्बों को बच्चों ने नज़दीक से देखा । धरती को अपने आँचल से हरा भरा बनाने वाली और जीवों को जीवन देने वाली पवित्र नदियों के प्रवाह को प्रभाव से भी बच्चे परिचित हुए । इन्हीं नदियों के किनारे ही मानवीय सभ्यताओं का विकास हुआ है । पहली बार बच्चों ने विश्व विरासत स्थल फतेहपुर सीकरी और आगरा के क़िले को प्रत्यक्ष रूप से देखा और उनकी शिल्पकला का दीदार किया । राजतंत्र के इन प्रतीकों को देखकर बच्चों ने आज के लोकतंत्र के महत्व को गहराई से समझा । राजतंत्र के इन आलीशान महल और आज के लोकतंत्र के आधारभूत संरचना और संस्थाओं के बीच अंतर को भी देखा और समझा ।
बुंदेलखंड की ग़रीबी और शेष भारत की आर्थिक स्थिति का भी आकलन बच्चों ने किया । उदारीकरण, निजीकरण आदि भूमण्डलीकरण का क्या असर हुआ है इस बात को भी समझने की कोशिश की गई । खास तौर से सड़कों का बढ़ता हुआ नेटवर्क पूरे देश को कैसे आपस में जोड़ रहा है, इसकी भौगोलिक जानकारी छात्रों को मिली । सड़कों पर बढ़ते हुए वाहनों का दबाव जहाँ अर्थव्यवस्था की तेज़ गति को इंगित कर रहा था तो वहीं पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से भी बच्चे रूबरू हुए । मैंने बच्चों को समावेशी और सतत विकास की बुनियादी बातें बताई । सभी विद्यार्थियों ने बड़े गौर से सारी जानकारी हासिल की और सुखद व खुशहाल भविष्य की उम्मीद के लिए सोचना शुरू किया ।
उपसंहार : बुंदेलखंड कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर (डॉ.) एस के राय के सहयोग, समर्थन और आशीर्वाद तथा यात्रा के संयोजक डॉ. शिवकुमार यादव के मार्गदर्शन एवं नेतृत्व तथा डॉ. नागेंद्र कुमार सिंह के कंधे से कंधा मिलाकर चलने के फलस्वरूप उपरोक्त एक दिवसीय शैक्षणिक यात्रा सकुशल, हर्षोल्लास के माहौल में सम्पन्न हो गई । एम. ए. के छात्रों धर्मेंद्र कुमार, शिखा वर्मा, स्तुति खरे, राधा भार्गव, मानवदीप कुशवाहा और हर्षवर्धन सोनी अतिरिक्त धन्यवाद के हकदार हैं जिनकी लगातार मेहनत की बदौलत यह यात्रा सम्पन्न हो पाई है । व्यवस्था और तैयारी के दौरान कई बार मैंने उन्हें डाट भी लगाई लेकिन बच्चों ने कभी उसे बुरा नहीं माना बल्कि और अधिक ज़िम्मेदारी के साथ काम किया । अब इसके बाद धन्यवाद शब्द का कौन सा रूप है जिसका प्रयोग उनके लिए किया जा सके । उन बच्चों को भरपूर प्यार और आशीर्वाद । यात्रा में शामिल सभी प्रिय विद्यार्थियों का भरपूर सहयोग मिला । किसी ने किसी भी बात को लेकर शिकायत नहीं की । जिस आत्मीयता, सम्मान, समर्पण, निष्ठा और प्रतिबद्धता के साथ विद्यार्थियों ने एक दूसरे का साथ निभाया, सहयोग किया, एक दूसरे का ध्यान रखा वह लाजवाब है । सबको देखकर लगता ही नहीं था कि यह सब विद्यार्थी हैं बल्कि लगता था कि यह सब एक परिवार के सदस्य हैं और प्यार की इक डोर से बंधे हुए हैं । लम्बे अरसे बाद मुझे इतने लोगों का स्नेहिल प्यार और साथ मिला… मैं भी अभिभूत हूँ और अपने ईश्वर, अपने आराध्य, अपने रहबर से सभी की सलामती और ख़ुशहाली की दुआ करता हूँ ।
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"Great article, Sir! The tour to Fatehpur Sikri looks amazing and very well-organized. Being in the 1st year, reading this makes us really excited and hopeful that our batch will also get a chance to experience such a memorable educational tour soon. Thank you for sharing!"
Bilkul
This is a very good educational tour and good experience and famous historical site
Education and experience is more powerful weapon that can change the world
wonderful journey...lot to learn about Indian history, culture, tradition and beautiful architecture.