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तागिन जनजाति…

Posted on अप्रैल 10, 2020जुलाई 12, 2020

कभी पूर्वोत्तर सीमांत एजेन्सी (नेफा) के नाम से जाना जाने वाला क्षेत्र “अरुणाचल” प्रदेश जनजातियों का घर है। यहां असंख्य जनजातियां निवास करती हैं जिनमें से मुख्य रूप से- मोनपा,मिजी, अका, शेरदुकपेन, निशी, अदी, दिगारू-मिशमी, मिजू-मिशमी,खामटी, नोकटे, तंगसा, वांचू, अपतानी तथा तगिन हैं। “तागिन” यहीं की एक “जनजाति”है।

विविधता पूर्ण पर समृद्ध सांस्कृतिक ताने-बाने बाने में आपस में एक दूसरे से गुंथी, जुड़ी यह जनजातियां अपनी उल्लास, एकरूपता और आध्यात्मिकता के एहसासों को वर्ष के अलग-अलग मौसमों में मनाए जाने वाले त्योहारों के रूप में अभिव्यक्ति देती हैं। “तागिन” जनजाति आदिवासी समुदायों में ऐसी प्रमुख जनजाति है जो स्वभावत: अभिमानी और स्वतंत्रता पसंद – प्रकृति की है। यह जनजाति हरे-भरे पर्वत वाले “अपर सुबान सिरी” जनपद में मुख्य रूप से निवास करती है। अपनी स्पष्टवादिता, सच्चाई, साहस तथा स्वतंत्र प्रकृति के लिए प्रसिद्ध “तागिन” जनजाति,आबूतानी जनजाति की वंशज मानी जाती है। यह समाज सृष्टि के प्रमुख सृजनकर्ताओं को मां, पिता और पितामह- पितामही आदि कहकर पुकारता है। प्रथम मनुष्य को वे “आबूतानी” यानी पिता कहते हैं। प्रकृति- पूजक तागिन लोग सर्व शक्तिमान परम सत्ता के दो रूपों को मानते हैं- दोनाई (सूर्य) और सी (पृथ्वी)। अन्य आदिवासी समुदायों की भांति इस समुदाय का जीवन मुख्य रूप से कृषि तथा मज़दूरी पर आधारित है।

“सी दोनाई” तागिन जनजाति का प्रमुख त्योहार है। प्रत्येक वर्ष 5 से 8 जनवरी तक यह भव्य रूप से धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसमें कई प्रकार की धार्मिक प्राथनाएं तथा अनुष्ठानों का आयोजन होता है तथा पशुओं की बलि चढ़ाई जाती है। तागिन लोग मानते हैं कि सी दोनाई ही जीवन के अस्तित्व की सर्वव्यापी परमसत्ता है। इस त्योहार का अपना पूरा एक दर्शन है। मान्यता है कि ब्रह्मांड की सून्यता में कुर्युम और कुल्लू दो आकृतियां अस्तित्व में आयीं। इन्हीं में से रियुचिन जेरिन,रियुमसी तथा रियमुदो का जन्म हुआ। रियुमचिन के दो पृथक रूप हैं- सेची चेरीचिजी (पृथ्वी) और नाइदो दोरीचिजी (आकाश)। इनके मिलन से ही पुरुष आत्मा का जन्म हुआ जिसे अतु सी (दादा) कहा गया। रियुमसी और रियुमदो की जुदाई के त्योहार को “सिचीनाइदो काम्बे-बेनम कहा जाता है। मिथक है कि इन दोनों की आपसी दरार के कारण “इची-पिंची” चमगादड़ अस्तित्व में आया। तागिन परम्परा में मेघ गर्जन को दोगुम, बिजली कड़कने को “दोरियाक”, भूकंप को “मुमी”, चन्द्रमा को “पोलो”, समुद्र को “हय” तथा दादी- दादा को क्रमशः “अयु” तथा “अतु” कहा जाता है।तागिन विश्वास के अनुसार “दोनाई” यानी सूर्य स्त्री है तथा चन्द्रमा को पुरुष माना जाता है।

अरुणाचल प्रदेश को उगते हुए सूर्य का देश भी कहा जाता है। मिथक यह भी है कि अतु-सी के कन्धों से चार देवताओं ने जन्म लिया। उन्नति और समृद्धि के देवता “पोते-हिल्लो”, कल्याण और स्वास्थ्य के देवता “किबू-लिबू”, धन के देवता “पाने-माने”तथा शक्ति के देवता “पालो-मालो” उत्पन्न हुए। इसी प्रकार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में तागिन जनजाति में परम्पराएं हैं। इस आदिवासी समाज का दर्शन, आध्यात्मिक ज्ञान तथा ऐतिहासिक तथ्य और विवरण का प्रमुख स्त्रोत उनका अपना मिथक शास्त्र है जिसे उन्होंने रचा और संजोया है। यहां तक कि आज भी वह न्याय की उम्मीद अपने मिथकीय देवताओं और अनुष्ठानों से करते हैं। मनुष्य के चरित्र, आयु, व्यक्तित्व तथा प्रगति के निर्धारण के लिए भी वह उन्हीं पर निर्भर हैं।

धार्मिक गीत,पाठ, अनुष्ठान तथा धार्मिक नृत्य के रूप में इस उत्सव के विभिन्न क्रियाकलाप, वस्तुत: जीवन के आरंभ तथा उसके अनुरक्षण में तागिन समाज के विश्वास की अभिव्यक्ति है। अरुणाचल प्रदेश के “तागिन” जीवन में अर्थ भरने वाला “सी- दोनाई” का त्योहार केन्द्रीय स्थान रखता है।

डॉ. राजबहादुर मौर्य, झांसी


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