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जीवंतता के साथ जीते “बोरोक आदिवासी” …

Posted on अप्रैल 6, 2020जुलाई 12, 2020

“बोरोक” आदिवासी त्रिपुरा की आदिवासी जनजाति है। यह अपने अतीत की स्मृतियों के साथ “बिंदास” और “जीवंतता” का जीवन जीती है। त्रिपुरा में 19 जनजातियां हैं जिनमें आठ समुदाय- त्रिपुरी, रियांग, नोवातिया, जमातिया, रूपिनी, कोलोई, उचई, और मुरासिंग कोक- बोरोक भाषा में संवाद करते हैं। त्रिपुरी अपने आप को “बोरोक” कहते हैं।

“बोरोक” शब्द का प्रयोग समूचे बोरोक समाज के जीवन- यापन के तौर-तरीकों और संस्कृति को सुनिश्चित तथा व्यक्त करने हेतु होता है। जैसे- चा- बोरोक, बोरोक खाने, कान – बोरोक और कोक- बोरोक, बोरोक पहनावे, तांग- बोरोक, बोरोक गतिविधियों और कोक- बोरोक, बोरोक भाषा आदि हेतु प्रयुक्त किए जाते हैं। बंगालियों के साथ इनका निकट का सम्बंध रहा है। त्रिपुरी लोग बंगालियों को “वंजबी” कहते हैं। उदाहरण के लिए कन- वंजबी (बंगाली पोशाक), चा- वंजबी (बंगाली खाना), कोक- वंजबी (बंगाली भाषा) आदि शब्दों का प्रयोग। बोरोक शब्द “बोरो” या “बोडो” शब्द का रूपांतरण है। यह तिब्बत के प्राचीन नाम “बोड” से आया है। मान्यता है कि एक समय वह तिब्बत में रहते थे और उनकी भाषा तिब्बतो- बर्मी भाषा परिवार से जुड़ी थी। कालांतर में यह समाज तिब्बत से भारत के दक्षिण भाग में आया और असम के मैदानी क्षेत्रों में बस गया।

इतिहासकार मानते हैं कि एक जातीय समूह के रूप में उनकी पहचान एकरूप नहीं है।वे भिन्न- भिन्न नामों से पुकारे जाते हैं। कूच बिहार में “कोच” और “राजवंशी”, उत्तर क्वछार में “दिमासा”, असम में “बोडो” और त्रिपुरा में त्रिपुरी या बोरोक। इसके अलावा मेक, सानोवाल, लुलुंग, थेंगल, आदि वे छोटे- छोटे प्रजातीय समूह हैं जो क़ौम के उत्तराधिकारी हैं। भूटान और सिक्किम में “ब्रोकपा” और लद्दाख घाटी में “बोड” नाम से रह रहे लोगों के बारे में भी यही माना जाता है कि वह भी इसी प्रजातीय समूह के हैं। इतिहासकार मानते हैं कि मंगोलियन प्रजाति के इन लोगों को महाभारत में “किरीत” कहा गया है।

त्रिपुरी लोग प्रकृति की पूजा करते हैं।वे वृक्षों, पौधों, नदियों आदि की पूजा करते हैं।वे अलौकिक शक्तियों पर यकीन करते हैं लेकिन दवाओं में जड़ी- बूटियों और पत्तियों का भी प्रयोग करते हैं।”मातई कोटोर” त्रिपुरियों के कुल देवता हैं। त्रिपुरा के प्रत्येक घर में एक चरखा होता है।सूत कातने की परम्परा थी। समतल भूमि पर खेती और पहाड़ों पर झूम खेती का प्रचलन था। संगीत कला और नृत्य उनके दैनिक जीवन का हिस्सा है। सूत कातना, कपड़ों को रंगना, विभिन्न रंगों में बुनना, फैशन और सजावट करना एक त्रिपुरी महिला के कर्तव्य माने जाते थे। “सुरबी लांगी थोकमोटोम” को विभिन्न किस्म के फूलों और रसों से तैयार किया जाता है। त्रिपुरी समाज के लिए त्रिपुरी शराब “लंगी” और “अरक” साधारण पेय है। असम में जलाशय बनाकर, पूर्वोत्तर में अन्न पैदा करने की पौध की खेती की तकनीक तथा पशुपालन की विधि से परिचित कराना इंण्डो-मंगोलियन लोगों का सबसे महान योगदान है। जंगल में धान की फसल से ही ये जीवन यापन करते हैं। उन्होंने भारत में पहली बार रेशम के कीड़े पालने और रेशम के कपड़े बुनने की तकनीक की शुरुआत की। मान्यता है कि जिसे हम बराक घाटी कहते हैं वह बोरोक शब्द का ही अपभ्रंश है। इसी प्रकार कछार शब्द,कोक बरोक शब्द क्वचार से बना है। इसी प्रकार त्वीब्रूखर शब्द डिब्रूगढ़,खामरूग कामरूप और कईमारवा कामाख्या आदि में परिवर्तित होते चले गए।

आज़ कोक-बरोक भाषा बोलने वाले आदिवासी समुदाय के पास प्रचुर मात्रा में साहित्य है। इस समुदाय की आठ जनजातियां अपनी भाषा में ही संवाद करती हैं। इनकी जनसंख्या लगभग सात लाख होगी। राज्य सरकार ने 1979 में कोक- बरोक को आधिकारिक भाषाओं में से एक के रूप में मान्यता दी है। राधा मोहन ठाकुर ने कोक- बोरोकमा नाम से कोक -बोरोक का पहला व्याकरण लिखा जो सन् 1900 में प्रकाशित हुआ। सन् 1271 में कुल्लुबाडी में जन्मे दौलत अहमद ने कोक- बोरोक भाषा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1948 में त्रिपुरा जन शिक्षा समिति अस्तित्व में आई। इस संस्था ने दूर दराज के इलाकों में 488 प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना किया। 1954 में कोक-बरोक की पहली पत्रिका “क्वतल कोथोमा”का प्रकाशन किया गया। इसके सम्पादक सुधनवा देव बर्मा थे। 1967 में बीरचंद्र देव बर्मा की अध्यक्षता में त्रिपुरा कोक- बोरोक उन्नयन परिषद की स्थापना हुई। “त्रिपुरा कोक बोरोक साहित्य सभा” ने गहरिया उत्सव के अवसर पर साहित्यिक पत्रिका “गहरिया” का प्रकाशन किया। इसके सम्पादक अलिंद्रलाल थे। कालांतर में इन्होंने पुस्तकें भी लिखीं।

कोक – बोरोक साहित्य धीरे-धीरे पूरी दृढ़ता के साथ अपने उत्साह, उमंग और मौलिकता के साथ आगे बढ़ रहा है। युद्ध व अन्य तबाहियों से मानव समाज में उत्पन्न होने वाली भयावह परिस्थितियों और मानवीय पीड़ा पर आधारित विचारों, भावनाओं और स्थितियों को इस साहित्य में काफी स्थान मिला है। बांग्लादेश में भी यद्यपि कोक- बोरोक बोलने वाली जनजातियां सर्वाधिक अल्पसंख्यक हैं तो भी इस समुदाय के पढ़े लिखे लोग अपनी भाषा और संस्कृति के विकास हेतु निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

– डॉ. राजबहादुर मौर्य, झांसी


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