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राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

Posted on दिसम्बर 24, 2019जुलाई 10, 2020

मानवीय सभ्यता के विकास के अनुक्रम में राजनीति का उद्भ़व उस पायदान पर होता है जब रीति- रिवाज तथा परम्पराओं पर टिकी कोई भी व्यवस्था चरमराने लगती है।ऐसी स्थिति में जो लोग कल तक आदतों के सहारे जी रहे होते हैं उन्हें भविष्य के लिए कार्यों के नये मानदंड बनाने पड़ते हैं। राजनीति में बहस और चर्चा दोनों अंतर्निहित हैं। यह ऐसी बौद्धिकता की इच्छा है जो रीति – रिवाजों के शासन को आलोचना और सवालिया निशानों से निर्बाध नहीं रहने देती।

यदि हम तर्क दें कि मनुष्य को वैसा करना चाहिए जैसा वह अतीत में करता आया है तो हमें उसे वैज्ञानिक अनुसंधान तथा तथ्यों से पुष्ट करना चाहिए। राजनीति के क्षेत्र में चिंतन ही मनुष्य का मोक्ष है, निर्वाण है। मनुष्य की सामूहिक नियति को सावचेत ढंग से और जानबूझकर नियंत्रित करने का काम ईश्वर का नहीं है और वह बिंदु भी अब बहुत पीछे रह गया है जहां मनुष्य भावना एवं परंपरा पर विश्वास करके किसी तरह जी लिया करता था।आज राजनीतिक ढंग से सोचने के प्रयास में ही मानव की परिपूर्णता निहित है।

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श्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने राजनीतिक व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन तथा विकास के महत्व को रेखांकित किया है। अपने उद्ब़ोधनों में वह सामाजिक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को असाधारण प्रतिभा के साथ रेखांकित करते हैं। क्योंकि यही मार्ग संविधान, कानून तथा व्यवस्था के मध्य से गुजरता है। उ.प्र.के वह पहले नेता हैं जो मौर्य, कुशवाहा, शाक्य,सैनी समाज से सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। अनेकों लोगों ने उनका अनुकरण कर राजनीति में अपनी पहचान बनायी। आजाद भारत के इतिहास में उ.प्र.की राजनीति में यह बड़े बदलाव का सूचक था।

स्वामी प्रसाद मौर्य ने लोगों को निष्ठा,लगन, समर्पण तथा ईमानदारी से धैर्य पूर्वक काम करना सिखाया। राजनीति मानव संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है, जिसका अपना एक अतीत है। बस, बहस इस बात की है कि राजनीति की हमारी समझ क्या है? क्या मानव परिस्थितियों को समझने में इसका कोई मूल्य है? साहित्य की भांति क्या राजनीति में भी प्रयोग किए जा सकते हैं? क्या यह मस्तिष्क को खोल सकता है? उसे उदार बना सकता है? उसे ताजगी देकर नये विचारों के लिए ग्रहणशीलता दे सकता है?

यदि गहनता तथा शांतचित्त से स्वामी प्रसाद मौर्य के विस्तृत फलक में फैले राजनीति सामाजिक जीवन का अध्ययन किया जाए तो उपरोक्त प्रश्नों के प्रति हमारी समझदारी सघन बनेगी,जिसकी हमें आवश्यकता है।

– डॉ राजबहादुर मौर्य, झांसी

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