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कबरा पहाड़ की गुफाएं- रायगढ़, छत्तीसगढ़

Posted on दिसम्बर 22, 2020दिसम्बर 22, 2020

कबरा पहाड़ के शैलाश्रय पुरातात्विक स्थल हैं जो रायगढ़ जिले से ८ किलोमीटर पूर्व में ग्राम विश्वनाथ पाली तथा भद्रपाली के निकट की पहाड़ी में स्थित हैं। यह पहाड़ घनी झाड़ियों तथा वृक्षों से घिरा हुआ दुर्गम स्थान है। यहां तक पहुंचने के लिए २ हजार फ़ीट की खड़ी चढ़ाई चढ़कर जाना पड़ता है। कबरा शैलाश्रय के चित्र गहरे लाल, खड़िया, गेरू रंग में अंकित हैं। इसमें कछुआ,अश्व तथा हिरनों की आकृतियां उकेरी गई हैं।

कबरा शैलाश्रय में जिले का अब तक का ज्ञात वन्य पशु जंगली भैंसे का विशालतम चित्र है।इसका मतलब है कि उस समय यहां पर यह जानवर पाये जाते थे। इसके साथ ही यहां पर मध्य पाषाण काल के लम्बे फलक, अर्धचंद्राकार लघु पाषाण के औजार चित्रित शैलाश्रय के निकट प्राप्त हुए हैं। यह क्षेत्र महानदी की घाटी में आता है। इस गुफा में प्राचीनतम मानव निवास के प्रमाण मिले हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरण में सिरपुर का जिक्र किया है। उसने लिखा है कि दक्षिण कौशल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर में ही था।

कबरा छत्तीसगढ़ी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है- धब्बेदार। यह मझोले और छोटे ऊंचाई के सघन वृक्षों और झाड़ियों से ढका हुआ बलुआ पत्थरों का विस्तृत पहाड़ है। यहां पर वनस्पतियों के हरे- भरे कैनवास में जगह- जगह उघड़े बलुआ पत्थरों की वजह से पूरा पहाड़ दूर से धब्बेदार दिखाई देता है। स्थानीय लोग इसे गजभार पहाड़ बतलाते हैं। विरहोर रायगढ़ जिले की विशिष्ट जनजाति है। यह धरम जयगढ़ क्षेत्र में निवास करती है। यह आदिम जनजाति की श्रेणी में है। इनकी जनसंख्या लगभग ३ हजार है। घुमन्तू प्रवृत्ति के कारण यह लोग आज भी खानाबदोश जीवन जीते हैं। इनके घास फूस के घरों को टंडा कहा जाता है। गोंड, कंवर, उरांव अन्य प्रमुख जनजातियां हैं।

आदिमानव आज की तरह घर नहीं बना सकते थे। वे मौसम की मार तथा जंगली जानवरों से बचने के लिए प्राकृतिक रूप से बनी गुफाओं में रहते थे। इन्हीं गुफाओं को शैलाश्रय या चट्टानों के घर कहते हैं। गुफाओं की दीवारों पर आदिमानव उस समय जो चित्र कारी करते थे इसे ही राक पेंटिंग अथवा शैल चित्र कहा जाता है। रायगढ़ जिले के समीप बसनाझर, ओंगना, करमागढ तथा लेखापाडा की पहाड़ियों में मानव सभ्यता के शुरुआती दिनों की झलक आज भी देखी जा सकती है। ऐसा माना जाता है कि आदिम समाज समतामूलक था। भावों की जटिलताएं तथाकथित सभ्य और विकसित समाज की देन हैं।

छत्तीसगढ़ आधुनिक काल में १६ वीं शताब्दी में अस्तित्व में आया। इससे पूर्व यह घने जंगलों का हिस्सा था। पहले इसे श्री पुर, रतनपुर, कौशल प्रदेश आदि नामों से जाना जाता था। यहां पर प्रागैतिहासिक मानव बसाहट के सबूत मिले हैं। दक्षिणी कौशल ही आज का छत्तीसगढ़ है। माना जाता है कि यहां पर ३६ गढ़ थे। इसी पर इसका नामकरण हुआ। जनरल कनिंघम ने इस क्षेत्र का पुराना नाम महाकौशल बताया है। मुगलकाल में इस क्षेत्र को रतनपुर राज्य कहा जाता था।

दिनांक १ नवम्बर २००० ई. को छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ। नये राज्य के रूप में अभी इसने मात्र २० वर्ष पूरे किए हैं। लगभग ढाई करोड़ की आबादी का यह राज्य एक लाख, पैंतीस हजार, एक सौ चौरानबे वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बसा हुआ है। यहां का विधानमंडल एक सदनीय है जिसमें ९० सीटें हैं। छत्तीसगढ़ राज्य से ११ सदस्य लोकसभा में तथा ५ सदस्य राज्यसभा में चुनकर जाते हैं। छत्तीसगढ़ भारत का एक ऐसा राज्य है जिसे महतारी (मां ) का दर्जा दिया गया है। पं. सुन्दर लाल शर्मा को छत्तीसगढ़ के गांधी कहा जाता है। वही महात्मा गांधी को २० दिसम्बर १९२० को पहली बार एक सत्याग्रह के लिए रायपुर में लाए थे।

गांधी जी ने रायपुर में जिस स्थान से एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था उसे ही आज़ गांधी चौक के नाम से जाना जाता है। बापू, आजकल के जनपद धमतरी के ग्राम कंडेल और कुरूद गये थे। छत्तीसगढ़ राज्य में लगभग २८६ किलोमीटर की यात्रा करने वाली महानदी, रायपुर के समीप धमतरी जिले में स्थित सिहावा नामक पर्वत श्रेणी से निकलती है। इसका प्रवाह दक्षिण से उत्तर की ओर है। साल का वृक्ष यहां का राजकीय वृक्ष है जो यहां पर सर्वाधिक पाया जाता है।

– डॉ. राज बहादुर मौर्य, फोटो गैलरी-संकेत सौरभ, अध्ययन रत एम.बी.बी.एस., झांसी, उत्तर प्रदेश

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