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विद्वता एवं अभिजात्यता का अनुपम संगम : प्रोफेसर हरि कृष्ण अरोड़ा

Posted on जुलाई 8, 2026जुलाई 8, 2026

डॉ. राजबहादुर मौर्य, असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, बुंदेलखंड कॉलेज झाँसी, उत्तर- प्रदेश (भारत) email id : drrajbahadurmourya@gmail.com, Website : themahamaya.com

परिचय : प्रस्तुत ब्लॉग फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज, जनपद रायबरेली के राजनीति शास्त्र विभाग में प्राध्यापक रहे प्रोफेसर हरि कृष्ण अरोड़ा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित है । फ़ीरोज़ गांधी कॉलेज, रायबरेली उत्तर- प्रदेश में स्थित एक प्रमुख ऐतिहासिक उच्च शिक्षण संस्थान है । इसकी स्थापना 8 अगस्त, 1960 को जनपद रायबरेली के तत्कालीन सांसद और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के दामाद फ़ीरोज़ गाँधी के द्वारा की गयी थी । लगभग 8.765 एकड़ में फैला हुआ, आज यह कॉलेज लखनऊ विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है और विज्ञान, कला, वाणिज्य, शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्रदान करता है ।

उत्तर- प्रदेश की राजधानी लखनऊ से मात्र 80 किलोमीटर दूर दक्षिण- पश्चिम में स्थित जनपद रायबरेली के उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठित महाविद्यालय फ़ीरोज़ गॉंधी कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग में प्राध्यापक प्रोफ़ेसर हरि कृष्ण अरोड़ा विद्वता एवं अभिजात्यता की जीती जागती मिसाल थे । मूल रूप से उत्तर- प्रदेश के जनपद मथुरा में जन्में एच. के. अरोड़ा ने वर्ष 1968 में फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज में राजनीति शास्त्र विभाग में बतौर प्रवक्ता कार्यभार ग्रहण किया था और दिनॉंक 30 जून, 1998 को फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज से ही अपने प्राध्यापकीय दायित्व से मुक्त हुए । उनकी ससुराल कानपुर के एक बहुत ही प्रतिष्ठित परिवार में थी । अरोड़ा जी के दो पुत्र हैं ।

लगभग 30 वर्षों तक फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज के माध्यम से जनपद रायबरेली की शैक्षिक सेवा करने वाले प्रोफेसर अरोड़ा जी बहुत ही शांत, सरल, सहज और विनम्र स्वभाव के थे । तीन दशक की लंबी सेवा अवधि में उनका कभी भी किसी से कोई विवाद और मनमुटाव तक नहीं हुआ । इतने लम्बे सेवाकाल के बावजूद उन्होंने जनपद रायबरेली में अपना निजी आवास नहीं बनाया । केवल नौकरी के शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ दिन रेलवे स्टेशन के पास एक किराए का कमरा लिया था लेकिन बाद में उसे भी छोड़ दिया और लखनऊ में रहने लगे थे तथा वहीं से आते- जाते रहते थे । यदि कभी कॉलेज में परीक्षाओं के दौरान या अन्य कारणों से उन्हें रुकना पड़ता था तो वह राजनीति विज्ञान विभाग में ही रात्रि प्रवास कर लेते थे । चूँकि राजनीति विज्ञान विभाग में दो कमरे थे इसलिए ठहरने में कोई कठिनाई नहीं होती थी ।

प्रोफेसर अरोड़ा जी के साथ राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर रहे और आजकल सिंगापुर में रह रहे डॉ. मधुसूदन मिश्र ने मुझे बताया कि “प्रोफेसर एच. के. अरोड़ा जी अपने निजी जीवन के बेताज बादशाह थे और वह अपनी शर्तों पर जीवन जीते थे । उनका पूरा परिवार बहुत ही उच्च शिक्षित और उच्च श्रेणी की सरकारी नौकरियों में था । यद्यपि उनकी उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से सम्पन्न हुई थी बावजूद इसके उन्होंने कभी भी किसी के प्रति हेय दृष्टि नहीं रखी बल्कि वह गरीब बच्चों की मदद करते थे । पूरी तरह से अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े- लिखे प्रोफेसर अरोड़ा जी का व्यक्तित्व अभिजात्य गुणों से युक्त था । कॉलेज में उनके साथी उन्हें लॉर्ड अरोड़ा कहकर पुकारते थे ।” उन्होंने मुझे यह भी बताया कि चूँकि उनका परिवार भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा से था इसलिए उनके सभी भाइयों तथा पिता के नाम में कृष्ण अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ था ।

प्रोफेसर एच. के. अरोड़ा जी अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध और तुलनात्मक राजनीति के प्रकाण्ड विद्वान थे और हमेशा चॉक और डस्टर का प्रयोग करके ही क्लास लेते थे । चूँकि वह अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाते थे और पढ़ने वाले अधिकतर छात्र हिन्दी माध्यम के होते थे इसलिए वह अपने लेक्चर को प्वाइंट्स में ब्लैक बोर्ड पर लिख देते थे ताकि किसी भी छात्र को व्याख्यान को समझने में कठिनाई न हो । इसलिए कठिन पेपर होते हुए भी उनके पेपर में छात्रों के अच्छे अंक आते थे । मैं उनके दौर में 1991-1995-96 तक तक़रीबन पाँच साल तक राजनीति विज्ञान का छात्र रहा और नियमित रूप से उनकी क्लास लेता था लेकिन मैंने कभी उन्हें किसी बात को लेकर ग़ुस्सा करते हुए नहीं देखा । वह थोड़ा धीरे बोलते थे लेकिन तथ्यात्मक बोलते थे इसलिए उनकी क्लास में कोई भी छात्र आपस में बातचीत नहीं करता था ।

विभाग के अन्य प्राध्यापकों की ही तरह से वह भी सिलेबस पूरा न होने की स्थिति में वह छुट्टी में अतिरिक्त क्लास लेकर कोर्स कम्पलीट करते थे । आज भी हम लोगों को अपने सर लोगों की पढ़ाई का स्टाइल और तौर- तरीक़ा बख़ूबी याद है । प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र जी की लम्बी चाल और हँसता- मुस्कुराता हुआ चेहरा आज तक भुलाए से भी नहीं भूला । जब वह पढ़ाते थे तो उनकी बॉडी लैंग्वेज क्या ग़ज़ब की होती थी । डॉ. आर. बी. वर्मा सर की क्लास और उनकी पढ़ाने की शैली, ओजस्वी व्याख्यान और समसामयिक मुद्दों पर बेबाक़ राय आज भी हम लोगों के ज़हन में ताज़ा है । सचमुच ऐसे विद्वान और सरल शिक्षकों के जीवन और आदर्श ने हम सब के व्यक्तित्व को सजाया और संवारा है ।

क़रीब तीन दशक तक उनके साथ प्राध्यापक और राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष व फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज के प्राचार्य रहे डॉ. राजबहादुर वर्मा उन्हें याद करते हुए कहते हैं “प्रोफ़ेसर अरोड़ा साहब बहुत ही सरल स्वभाव के और नेक इंसान थे । किसी भी प्रकार की लालच करना, किसी को धोखा देना, किसी को अपमानित करना, किसी से भी ऊँची आवाज़ में बोलना या बात करना, किसी के ऊपर कटाक्ष करना जैसे अवगुणों से वह कोसों दूर थे । वह अपने विषय में मर्मज्ञ थे । समय से कॉलेज आना और समय से अपनी क्लास पढ़ना उनके व्यक्तित्व की पहचान थी । विभागीय कार्यों में भी उनका ख़ूब योगदान रहता था । हॉ, अपने निजी जीवन में वह बहुत रिज़र्व रहते थे और कहीं बाहर ज़्यादा आना- जाना नहीं रहता था । अपने इसी स्वभाव के चलते वह कभी भी शोध निदेशक नहीं बने और कोई भी पीएचडी नहीं कराई ।

वर्ष 1996-97 में वह कॉलेज से प्रकाशित होने वाली वार्षिक पत्रिका काशिका के संपादक भी रहे ।” डॉ. वर्मा ने मुझे यह भी बताया कि जनपद रायबरेली में प्रोफेसर अरोड़ा साहब ने अपने एक बेटे की शादी किया था । यह परिवार जनपद रायबरेली के प्रतिष्ठित परिवारों में से एक था और लोग इस परिवार को कक्कड़ साउंड सर्विस के नाम से जानते थे । डॉ. रामबहादुर वर्मा से जब मैंने बरबस पूछा कि सर आप तो उनके साथ लगभग 30 वर्षों तक प्राध्यापक रहे हैं तो ऐसे में आप आज उन्हें कैसे याद करते हैं ? तो उन्होंने मुझे एक शेर सुनाया और कहा कि यह प्रोफ़ेसर अरोड़ा साहब के व्यक्तित्व पर सटीक बैठता है और वह है : दुनिया में हूँ, दुनिया का तलबगार नहीं हूँ । बाज़ार से गुज़रा हूँ, खरीददार नहीं हूँ ।।

अन्ततः एक प्रतिष्ठित और सम्पन्न परिवार में जन्में, अभिजात्य गुणों से युक्त प्रोफ़ेसर एच. के. अरोड़ा जी ने अपनी पैतृक संपत्ति और सुख सुविधाओं का त्याग कर प्राध्यापकीय जीवन का कठिन संकल्प लिया और ताउम्र अपने जीवन को समाज की बेहतरी और बदलाव के लिए समर्पित कर दिया । यदि वह चाहते तो बड़े व्यवसायी बन ऐशो- आराम की ज़िन्दगी जी सकते थे । अपने माता-पिता के बहुत ही लाड़ले प्रोफेसर अरोड़ा जी ने कठिन तथा अनवरत परिश्रम करके ऊँचाई की बुलंदियों को छुआ । उनका जीवन अंधविश्वास और कुरीतियों से मुक्त था और वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण के पैरोकार थे । अनुशासन उन्हें बेहद प्रिय था । आजीवन उनके ऊपर किसी भी प्रकार के आरोप नहीं लगे । जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्रीयता की हिमायत उन्होंने कभी नहीं किया । विनम्रता, सहजता, सरलता और बौद्धिकता उनके व्यक्तित्व में समाहित थे ।

उनके नज़दीक जाने पर बहुत अपनापन लगता था । आज वह हमारे बीच में नहीं हैं बावजूद इसके प्रेम और अपनेपन से अनुरक्त यही डोर आज भी हम जैसे अनगिनत लोगों को उनसे जोड़े हुए है । इटली के कवि रेनन ने लिखा है “अतीत का समान गौरव, वर्तमान में समान आकांक्षा, साथ-साथ मिलकर किए गए महान कार्य, वैसे ही कार्यों को पुनः करने की इच्छा, यह सभी किसी व्यक्ति को राष्ट्र भाव से प्रेरित करने वाली अनिवार्य स्थितियाँ हैं । हम जितने अधिक कष्ट सहन कर त्याग करते हैं, उसी अनुपात में उनके प्रति हमारी आसक्ति बढ़ती है।” अपने महापुरुषों और गुरुओं के प्रति निष्ठा और कृतज्ञता व्यक्त करने का यही मूल उद्देश्य और वैचारिक आधार है । करुणा, मैत्री और बन्धुत्व से प्रेरित ज्ञान का सौन्दर्य अनन्त है और यह कभी फीका नहीं पड़ता । प्रोफ़ेसर अरोड़ा साहब का जीवन हमें सिखाता है कि “ईश्वर और मानवता को सभी की फ़िक्र करनी चाहिए, केवल विशेष लोगों की नहीं ।”

(प्रस्तुत आलेख फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज, रायबरेली (उत्तर- प्रदेश) में फ़ीरोज़ गॉंधी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य एवं राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आर. बी. वर्मा एवं पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मधुसूदन मिश्र द्वारा दी गयी जानकारी पर आधारित है । इसके अतिरिक्त मैंने अपनी स्मृति से भी कुछ जोड़ा है । कोई कमी होने पर पाठक मुझे मेरे मेल पर अवगत कराने की कृपा करेंगे । मैं सुझावों का स्वागत करूँगा ।)

डॉ राज बहादुर मौर्य
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