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बहुमुखी प्रतिभा, प्रज्ञा, करुणा, विद्वता और समभाव के प्रतीक : प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र

Posted on जुलाई 24, 2026जुलाई 25, 2026

डॉ. राजबहादुर मौर्य, असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी (उत्तर- प्रदेश) भारत । email : drrajbahadurmourya @ gmail.com, website : themahamaya.com

प्रस्तुत ब्लॉग भारत में, उत्तर- प्रदेश राज्य के, जनपद रायबरेली, स्थित फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज के राजनीति विज्ञान विभाग में लगभग 35 वर्षों तक निरंतर प्राध्यापकीय सेवाएँ देने वाले बहुत ही लोकप्रिय और प्रकाण्ड विद्वान, राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष रहे आदरणीय प्रोफेसर (डॉ.) मधुसूदन मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में है । फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज से सेवानिवृत्त होने के बाद वह तीन वर्ष तक श्री गांधी महाविद्यालय, घुरवारा, रायबरेली के प्राचार्य भी रहे । यहीं रहकर उन्होंने “इक्कीसवीं शताब्दी में भारतीय लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ” जैसे ज्वलंत विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जिसमें प्राप्त उत्कृष्ट शोध- पत्रों का संकलन एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी किया गया । कभी कानपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहे और आजकल लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज, रायबरेली, अपनी गुणवत्ता पूर्ण उच्च शिक्षा और उत्कृष्ट व सुव्यवस्थित आधारभूत शैक्षणिक सुविधाओं के लिये जाना जाता है । जनपद रायबरेली के प्रथम सांसद स्वर्गीय फ़ीरोज़ गाँधी के द्वारा दिनॉंक 8 अगस्त, 1960 को स्थापित किया गया यह महाविद्यालय आज भी उच्च शिक्षा का बेहतरीन केन्द्र है ।

परिचय

भारत की आज़ादी के तीन वर्ष पूर्व यानी वर्ष 1944 में, जनपद जौनपुर, उत्तर- प्रदेश में ममतामयी माँ श्रीमती कलावती देवी और पूज्य पिता श्री सरयू प्रसाद मिश्र के सुपुत्र के रूप में जन्में प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र जनपद रायबरेली में उच्च शिक्षा जगत की अनमोल धरोहर हैं । सर्वधर्म समभाव और सर्वधर्म ममभाव की विश्वव्यापी अवधारणा से अनुरक्त प्रोफेसर मधुसूदन मिश्र प्रज्ञा, करुणा, विद्वता, ज्ञान, विनम्रता, सहजता, सरलता और सादगी के प्रतीक हैं । दिनॉंक 08-08-1972 से लेकर 30 जून, 2007 तक जनपद रायबरेली में उच्च शिक्षा जगत को समर्पित भाव से अपनी सेवा प्रदान कर आम जनमानस के बौद्धिक स्तर को ऊँचा उठाने में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा है । प्रोफेसर मधुसूदन मिश्र के पिता जी श्री सरयू प्रसाद मिश्र, वनस्थली विद्यापीठ, जयपुर, राजस्थान के प्राचार्य रहे थे और वहीं पर उनका शरीरांत भी हुआ था । वह भी न केवल उच्च कोटि के विद्वान थे बल्कि देश के बौद्धिक जगत में उनकी विशिष्ट पहचान थी । उस दौर में भी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी । उनके जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव उनके पिता जी का था । चूँकि पिता जी अंग्रेज़ी के प्रकाण्ड विद्वान और शिक्षाविद थे इसलिए उनकी चाहत थी कि उनका बेटा भी उन्हीं की तरह अंग्रेज़ी भाषा बोलने, लिखने और पढ़ने में पारंगत हो । उनकी सीख थी कि ईमानदारी का जीवन जीना और अपने कैरियर पर कोई लांछन न लगने देना । प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र ने पिता की दी गई नसीहत का हमेशा पालन किया और हमेशा उच्च मानदंडों से युक्त सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक जीवन को अपने व्यक्तित्व में उतारा । यही वजह रही कि कभी भी उन पर किसी भी प्रकार का हेराफेरी का अथवा अपने- पराए का आरोप नहीं लगा । अब तक का उनका जीवन पवित्र और निष्कलंक रहा ।

श्री सरयू प्रसाद मिश्र (पिता) एवं श्रीमती कलावती देवी (माँ)

शिक्षा एवं पारिवारिक जीवन

चूँकि प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र के पिताजी वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान में प्राचार्य थे इसलिए मधुसूदन मिश्र की प्राथमिक शिक्षा वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान से ही सम्पन्न हुई । वर्ष 1966 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक तथा 1968 में यहीं से राजनीति विज्ञान विषय में उत्कृष्ट अंकों के साथ स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की । इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तत्कालीन दौर के सर्वश्रेष्ठ और विद्वान प्रोफेसर ए. बी. लाल, प्रोफ़ेसर एच. एम. जैन, प्रोफेसर मदन गोपाल गुप्ता, प्रोफेसर आशाराम और प्रोफेसर ए. डी. पन्त जैसे प्रोफ़ेसरों का सानिध्य मिला । इन सभी विद्वानों का गहरा प्रभाव मधुसूदन मिश्र के जीवन पर पड़ा । वर्ष 1968 में परास्नातक की उपाधि हासिल कर डॉ. मधुसूदन मिश्र उच्च शिक्षा के प्राध्यापकीय जीवन से जुड़ गए तथा जनपद जौनपुर और फ़तेहपुर के प्रतिष्ठित कालेजों में अल्पकालीन सेवा प्रदान कर फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज रायबरेली के अति प्रतिष्ठित परिसर में आ गये और यहीं पर रहकर उन्होंने उच्च शिक्षा जगत की बुलंदियों को छुआ और अपना पूरा जीवन इसी परिसर को समर्पित कर दिया । अपने पॉंच भाइयों में मधुसूदन मिश्र सबसे छोटे थे और उनकी दो बहनें भी थीं । वर्ष 1970 में वह शादी के पवित्र बंधन में बंधे । मूल रूप से बांदा ज़िले की निवासी उनकी पत्नी श्रीमती उर्मिला मिश्र भी केन्द्रीय विद्यालय, जनपद रायबरेली से अंग्रेज़ी विषय के प्रवक्ता पद से सेवानिवृत हुई थीं । प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र की एक बेटी मनीषा मिश्रा और एक बेटा मण्डन मिश्र है । सम्प्रति बेटा सिंगापुर में रहता है । यह भी एक महत्वपूर्ण बात है कि प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र के बड़े भाई श्री प्रियव्रत मिश्र ने लगभग 29 वर्ष नाइजीरिया में रहकर अपनी सेवाएँ दी हैं । वर्ष 1984 में प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर (डॉ.) मोहम्मद मुर्तज़ा खान के निर्देशन में “भारत में क्षेत्रीयतावाद की राजनीति : पंजाब राज्य के विशेष संदर्भ में” अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से पूरा किया और डाक्टर की उपाधि धारण किया ।

फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज के बौद्धिक परिसर में

लगभग 35 वर्षों तक फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज के, राजनीति विज्ञान में रहकर प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र ने पूरी प्रतिबद्धता, समर्पण, तन्मयता और निष्ठा व ईमानदारी के साथ अध्यापन कार्य किया । उनके निर्देशन में 10 छात्रों ने विभिन्न विषयों पर शोध कार्य किया और पीएचडी की उपाधि हासिल किया । इनमें से कई शोध छात्र आज प्रदेश और देश के विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं । महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उनके निर्देशन में शोध कार्य करने वाला कोई भी विद्यार्थी आज बेरोज़गार नहीं है बल्कि सभी लोग शैक्षिक जगत में अपना योगदान दे रहे हैं । दर्जनों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों में उन्होंने न केवल सहभागिता की वरन् विद्वतापूर्ण शोध पत्र भी प्रस्तुत किए । प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र का शोध कार्य कालान्तर में, वर्ष 1988 में नई दिल्ली के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित हुआ और उसकी एक प्रति संयुक्त राज्य अमेरिका के काँग्रेस की लाइब्रेरी में संरक्षित और संकलित की गयी । आज भी वहाँ के वह शोधार्थी जो भारत में क्षेत्रीयतावाद की राजनीति पर शोध करते हैं वह उस पुस्तक का संदर्भ देते हैं । यह एक गौरव की अनुभूति देती है । इस अतिरिक्त दो पुस्तकों का उन्होंने सम्पादन भी किया । जिसमें वर्ष 1980 की संसदीय पत्रिका प्रमुख है । इस पत्रिका में जनपद रायबरेली के संसदीय चुनाव का विस्तृत विश्लेषण किया गया था । फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज की प्रतिष्ठित वार्षिक पत्रिका काशिका के वह कई बार सम्पादक रहे और पत्रिका को बौद्धिक जगत की ऊंचाइयों तक पहुँचाने में महती भूमिका निभाई । लम्बे समय तक वह कॉलेज में राष्ट्रीय सेवा योजना (एन. एस. एस.) के कोआर्डीनेटर रहे और उन्हीं के नेतृत्व में पहली बार फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज की एनएसएस इकाई का पहला दस दिवसीय कैम्प रायबरेली के शहर मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर हरदासपुर गाँव में लगाया गया था ।

राजनीति विज्ञान विभाग में…

उम्र के साढ़े तीन दशक तक फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज, रायबरेली के राजनीति विज्ञान विभाग में अपनी सेवाएँ देने वाले प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र विभाग की शान थे । धाराप्रवाह अंग्रेज़ी और हिन्दी भाषा में संवाद करने और व्याख्यान देने वाले प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र की गणना देश के प्रतिष्ठित राजनीति शास्त्रियों में होती थी । जिस समय उन्होंने फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज, रायबरेली में कार्यभार ग्रहण किया था उस समय कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सुरेन्द्र कुमार सिन्हा थे जिन्हें आमतौर पर ससम्मान एस. के. सिन्हा कहकर सम्बोधित किया जाता था और वह भी राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर थे । तत्कालीन समय में राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर महेश चन्द्र जौहरी थे । विभाग के अन्य प्राध्यापकों में प्रोफ़ेसर रामबहादुर वर्मा (आर. बी. वर्मा ) और प्रोफेसर हरिकृष्ण अरोड़ा (एच. के. अरोड़ा) शामिल थे । आगे चलकर प्रोफ़ेसर महेश चन्द्र जौहरी और प्रोफ़ेसर राम बहादुर वर्मा फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज के प्राचार्य भी बने । इन सभी विद्वानों प्रोफ़ेसरों के बीच प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र चमकते हुए सितारे की भाँति थे । लम्बा, गोरा और इकहरा बदन, पैंट के नीचे सलीके से दबी हुई आधी बांह की सर्ट और उस पर लगी हुई ब्रांडेड बेल्ट, लम्बे और तेज़ी से चलते हुए क़दम, फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी बोलते हुए किसी अंग्रेज भारतीय जैसे लगते थे । प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र ने अपने रिफ़्रेशर कोर्स जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली और पंजाब विश्वविद्यालय पंजाब जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से किया था । वर्ष 1991 में राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा “Communalism and National Integration in India” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही है ।

कक्षाओं में प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र…

यद्यपि “भारतीय शासन और राजनीति” विषय में उनकी विशेषता थी बावजूद इसके वह “अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध” और “लोक प्रशासन” के प्रकाण्ड विद्वान थे तथा स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन हेतु यही उनका पेपर हुआ करता था । इसके अलावा भारतीय संविधान पर उनकी बेजोड़ पकड़ थी । वर्ष 1992 से 1995 तक मुझे भी उनके सानिध्य में रहकर राजनीति विज्ञान पढ़ने का सौभाग्य मिला । मेरे दिलोदिमाग़ में आज भी प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र जी की हँसती, मुस्कुराती और लम्बे कदमों से चलती हुई छवि हुबहू अंकित है । वह बिल्कुल सही समय पर क्लास में उपस्थित हो जाते थे और बिना किसी औपचारिकता और देरी के अपना व्याख्यान प्रारम्भ कर देते थे और पूरे 45 मिनट बाद ही क्लास समाप्त करते थे । यद्यपि वह क्लास में चॉक और डस्टर का प्रयोग कम करते थे लेकिन उनका व्याख्यान इतना प्रभावशाली होता था कि पूरे समय क्लास में पिनड्राप साइलेंस होता था । कोई भी छात्र किसी भी प्रकार की बातचीत नहीं करता था । व्याख्यान के अंत में पॉंच मिनट का समय वह छात्रों को प्रश्न पूछने के लिए देते थे । यदि कभी उन्हें पत्रकारिता के सिलसिले में कहीं पर क्लास के समय रिपोर्टिंग के लिए अर्जेंट जाना होता था तो वह अपनी निर्धारित क्लास को विभाग के किसी प्राध्यापक से समय के हिसाब से बदल लेते थे और उसे पढ़ाकर ही निकलते थे । अगर ऐसा सम्भव नहीं हो पाता था तो वह अगले दिन एक अतिरिक्त क्लास लेकर पिछले दिन की भरपाई करते थे । कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि उनके पेपर का निर्धारित सिलेबस अधूरा रह गया हो बल्कि कई बार वह अपने पेपर का दुबारा रिवीज़न करा देते थे । आज जब हम लोग प्राध्यापकीय जीवन में हैं तो सर की दी गई सीख काम आती है और नियमित तथा निर्धारित क्लास न पढ़ाने पर आत्मग्लानि होती है । मुझे अब भी याद आता है कि जब वह अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों के जटिल पहलुओं पर चर्चा करते थे तो उनकी बॉडी लैंग्वेज ऐसी होती थी कि जैसे वह बहुत सामान्य विषय पर बातचीत कर रहे हों । एक मज़ेदार बात यह थी कि वह हमेशा व्याख्यान के दौरान भी “साहब” शब्द का प्रयोग बहुत करते थे इसलिए हम बच्चे उनकी अनुपस्थिति में उन्हें “साहब वाले सर” कहकर उन्हें सम्बोधित करते थे । गर्व इस बात का भी है कि प्राध्यापकीय दायित्व से मुक्त होने के बाद उन्होंने अपनी स्वयं की उत्कृष्ट एवं मानक पुस्तकों को अपने छात्रों और फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज के पुस्तकालय को दान कर दिया ताकि उनका प्रयोग अन्य जिज्ञासु भी कर सकें ।

छठीं, उत्तर- प्रदेश राजनीति विज्ञान परिषद की कांफ्रेंस का आयोजन

फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज, रायबरेली के अतीत का एक स्वर्णिम अध्याय यह भी है कि दिनॉंक 14 एवं 15 फ़रवरी, 1987 को राजनीति विज्ञान विभाग के द्वारा छठीं स्टेट पॉलिटिकल साइंस कांफ्रेंस का आयोजन किया गया । युवा जोश से भरपूर प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र इस कांफ्रेंस के आर्गनाइजिंग सेक्रेटरी थे जबकि विभागाध्यक्ष प्रो. रामबहादुर वर्मा आयोजन सचिव थे । फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज के नवनिर्मित भव्य “इंदिरा गाँधी सभागार” में जब इस कांफ्रेंस का उद्घाटन हुआ तो वह छवि देखते ही बनती थी । प्रोफेसर मधुसूदन मिश्र ने मुझे बताया कि तत्कालीन समय में इस आयोजन में कुल 60 हज़ार रुपये का खर्च आया था जिसमें कॉलेज के प्रबन्ध मंत्री श्री ओंकारनाथ भार्गव ने दिल खोलकर और उदारतापूर्वक सहयोग किया था । उन्होंने यह भी बताया कि रायबरेली शहर के व्यापारियों और व्यवसायियों से हम विभाग के प्राध्यापकों ने मिलकर आर्थिक सहयोग मांगा था और सभी ने हमारा सहयोग किया था । कांफ्रेंस में पूरे उत्तर- प्रदेश से लगभग 200 विद्वान प्रोफ़ेसरों, शोधार्थियों और छात्रों ने पंजीकरण करा कर आयोजन को सफल बनाया था ।

पत्रकारिता जगत में अवदान

बहुमखी प्रतिभा के धनी, प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र का लोकतंत्र के चौथे स्तंभ अर्थात् पत्रकारिता जगत में भी उल्लेखनीय योगदान रहा है । वर्ष 1976 में उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत अंग्रेज़ी भाषा में छपने वाले देश के सबसे प्रतिष्ठित दैनिक अख़बार “द टाइम्स ऑफ इंडिया” नई दिल्ली से किया । कालान्तर में वह “टाइम्स ऑफ इंडिया, लखनऊ” के जिला संवाददाता बने । इसी दौर में वह उत्तर भारत के प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी अखबार “नार्दन इंडिया पत्रिका ” के जनपद रायबरेली के जिला संवाददाता रहे । दिनांक 16-05-1997 से प्रोफेसर मधुसूदन मिश्र ने अंग्रेज़ी अख़बार “द हिन्दुस्तान टाइम्स” के जिला संवाददाता के रूप में लम्बे समय तक काम किया । वर्ष 1990-92 में वह हिंदी दैनिक समाचार पत्र “अमर उजाला” कानपुर संस्करण के जनपद रायबरेली के व्यूरो चीफ़ रहे । इसी दौरान वह भारत के सबसे बड़े और लोकप्रिय हिन्दी अख़बार “जनसत्ता” नई दिल्ली के जिला संवाददाता भी रहे । यह प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र के सामाजिक सरोकार थे जिन्होंने उन्हें पत्रकारिता के माध्यम से आमजन की आवाज़ और समस्याओं को उजागर करने के लिए प्रेरित किया । पत्रकारिता के प्रति उनका जुनून इस कदर था कि उन्होंने 75 वर्ष की उम्र तक पत्रकारिता के ज़रिए समाज और राष्ट्र की सेवा किया । वर्ष 2019 में उन्होंने पत्रकारिता जगत् को अलविदा कहा । अपने पत्रकारिता के दौर में प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र ने देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक का साक्षात्कार किया । उन्होंने अपनी लेखनी के ज़रिए गॉंव की गली- मोहल्लों, खेत-खलिहानों से लेकर शहर की तमाम समस्याओं को बड़ी निर्भीकता से उठाया ।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय देशाटन

दार्शनिक शब्दों में कहा जाए तो “जीवन एक यात्रा है” । यात्राएँ इंसानों को अनेकता में एकता का बोध कराती हैं । नए दोस्त, नया परिवेश, नया अनुभव, नया खानपान, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता का विकास यात्राओं के माध्यम से ही होता है । प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र को देशाटन बहुत प्रिय था इसलिए जब भी उन्हें मौक़ा मिलता वह कभी सपरिवार और कभी अकेले तो कभी अपने मित्रों के साथ देश के विभिन्न हिस्सों की लम्बी यात्राओं पर निकल जाते थे । पूर्वोत्तर भारत को छोड़कर शेष पूरे भारत की उन्होंने यात्रा की । वर्ष 1977 में उन्होंने प्रोफ़ेसर एस के सिन्हा के साथ बंगलौर की यात्रा की और वहाँ पर आयोजित “आल इंडिया पॉलिटिकल साइंस” के सालाना जलसे में शामिल हुए । इसके बाद होने वाले लगभग सभी कांफ्रेंसों में उनकी उपस्थिति रहती थी । यह सालाना जलसे प्रत्येक वर्ष देश के विभिन्न राज्यों में आयोजित किए जाते थे और आज भी किए जाते हैं । वर्ष 1983 में उन्होंने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती उर्मिला मिश्रा के साथ, जनपद रायबरेली से चलकर देश के अंतिम छोर यानी कन्याकुमारी तक की यात्रा सड़क मार्ग से पूरी की । गाँव से लेकर शहर तक के भारत भ्रमण में, लगभग 9 हज़ार किलोमीटर की यात्रा में, वह देश के 9 राज्यों से होकर गुज़रे । इस यात्रा में उन्होंने भारत के बहुरंगी और सामासिक स्वरूप को प्रत्यक्ष रूप से देखा । भारत की भौगोलिक विविधता, सामाजिक बहुलता, खानपान और रहन सहन की तहज़ीब, सभी को उन्होंने नज़दीक से देखा । देश के विभिन्न हिस्सों में पुष्पित और पल्लवित होने वाली नई सभ्यता, नई संस्कृति से वह रूबरू हुए । यात्राओं ने उन्हें सिखाया कि ख़ुशी और ग़म की एक दुनिया उनसे बाहर भी बसती है । प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र के जीवन में जो सहजता, सरलता, लचीलापन और समाज के अन्य विभिन्न दृष्टिकोणों और तरीक़ों के प्रति जो सराहना, समझ और सम्मान है, उसका एक बड़ा कारण यह देशव्यापी यात्राएं भी हैं । उन्होंने यात्राओं के माध्यम से ही सीखा है कि दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है और यहाँ पर सीखने, समझने, लिखने और प्रशंसा करने के लिए बहुत कुछ है । इसके साथ ही उत्तर- प्रदेश पॉलिटिकल साइंस के सभी कांफ्रेंस में प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र की उपस्थिति रहती थी ।

सीएसडीएस में सेंट्रल यू.पी. के कोआर्डीनेटर

देश के प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री रजनी कोठारी द्वारा वर्ष 1963 में स्थापित विकासशील समाजों के अध्ययन केन्द्र अर्थात् सी. एस. डी. एस. में भी वर्ष 1998 और 1999 में प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र ने काम किया है । इस दौरान उन्होंने सेन्ट्रल यूपी के कोआर्डीनेटर के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी निभाई । फ़ीरोज़ गाँधी कॉलेज के परास्नातक के छात्रों को भी इस सर्वेक्षण में शामिल होने का मौक़ा मिला । मैं भी सर्वेक्षण की टीम का एक सदस्य था । इसी सर्वेक्षण की ट्रेनिंग के लिए हम सभी लोग इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कई दिनों तक ठहरे हुए थे जहाँ प्रोफ़ेसर योगेन्द्र यादव, नई दिल्ली और प्रोफ़ेसर प्रदीप कुमार, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, सरीखे विद्वान लोगों से मिलने और संवाद करने का सुअवसर मिला था । यह सब प्रोफेसर मधुसूदन मिश्र के मार्गदर्शन और सौजन्य से ही हो पाया । आज जब मैं क्लास में रिसर्च मैथडोलॉजी का पेपर पढ़ाता हूँ तो सीएसडीएस में मिली जानकारी बहुत सहायक होती है । भारतीय राजनीति और समाज के अध्ययन पर मौलिक और उत्कृष्ट शोध कार्य करने वाला यह संस्थान अपनी विश्वसनीयता के लिए जाना जाता है । संस्थान द्वारा प्रतिमान और स्टडीज इन इण्डियन पॉलिटिक्स जैसी प्रसिद्ध अकादमिक पत्रिकाएँ भी प्रकाशित की जाती हैं ।

अन्ततः

आज जब अपने जीवन साथी को इस भौतिक संसार से खोकर प्रोफेसर मधुसूदन मिश्र सर भारत की धरती से दूर सिंगापुर में अपने बेटे और बहू के साथ निवास कर रहे हैं और हम जैसे अनगिनत लोगों का सम्पर्क सिर्फ़ मोबाइल फ़ोन के ज़रिए हो पाता है तो बरबस उनकी याद आती है । जब झाँसी से जनपद रायबरेली शहर जाना होता है तो कुछ खालीपन लगता है । यद्यपि शहर वही है, अपनापन वही है लेकिन अपनों से दूर होने का दर्द होता है । उन्होंने हम जैसे अनगिनत लोगों को सिखाया है कि हमें सिर्फ़ संवैधानिक स्वतंत्रता का ही नहीं बल्कि मानवीय समानता का पक्षधर बनकर उन लोगों की आवाज़ को बुलंद करते रहना है जो गरीब, लाचार, असहाय और बेबस हैं । हमारा यह प्रयास उन्हें मानवीय गरिमा और सम्मान दिलाएगा । दुनिया के इतिहास में वही लोग मुक्तिदाता बने जिन्होंने अज्ञानता, ग़रीबी, बेरोज़गारी, बेबसी और दासता से विमुक्ति के जैसे कलंक को ख़त्म करने के लिए अपने जीवन को खपा दिया । प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र का जीवन ज्ञान, त्याग और समर्पण की उसी चिरंतन धारा से गहरे रूप से जुड़ता है जिसका सारी मानवता से सरोकार है । उनका कर्मप्रधान जीवन हमें सिखाता है कि योग्यता में अंतर मनुष्य को मनुष्य से अलग नहीं करती बल्कि योग्यता सिखाती है कि सब मनुष्य समान हैं । जनहित सदैव निजी हितों से ऊपर होता है और यदि नहीं होता तो होना चाहिए । किसी व्यक्ति के निजी जीवन की अपेक्षा उसके सार्वजनिक जीवन, उसके अनुभव, उसके संघर्ष, उसके त्याग और समर्पण तथा विचारों को तरजीह दी जानी चाहिए । ज्ञान अनन्त सौन्दर्य है जो कभी भी फीका नहीं पड़ता ।

डॉ राज बहादुर मौर्या
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13 thoughts on “बहुमुखी प्रतिभा, प्रज्ञा, करुणा, विद्वता और समभाव के प्रतीक : प्रोफ़ेसर मधुसूदन मिश्र”

  1. कैप्टन डा विष्णु चन्द्र श्रीवास्तव कहते हैं:
    अगस्त 7, 2026 को 8:15 अपराह्न पर

    बड़े़ भाई डा राजबहादुर सर ने
    आदरणीय डा मधुसूदन मिश्रा जी के व्यक्तित्व की बहुत सुन्दर समीक्षा की है। सर के आदर्श हम सभी का मार्ग निर्देशन कर रहे हैं।

    प्रतिक्रिया
  2. नवनीत कुशवाहा, बुंदेलखंड कालेज, झांसी, उत्तर प्रदेश (भारत) कहते हैं:
    जुलाई 30, 2026 को 12:14 अपराह्न पर

    ब्लॉग को पढ़कर प्रोफेसर मधुसूदन मिश्र जी के बारे में बहुत अच्छी जानकारी मिली… लेखक बधाई के हकदार हैं।

    प्रतिक्रिया
    1. Dr. Raj Bahadur Mourya कहते हैं:
      जुलाई 30, 2026 को 1:42 अपराह्न पर

      शुक्रिया आपका भाई जी

      प्रतिक्रिया
  3. Sumuta कहते हैं:
    जुलाई 30, 2026 को 4:20 पूर्वाह्न पर

    Excellent expression of life. Respectable.

    प्रतिक्रिया
    1. Dr. Raj Bahadur Mourya कहते हैं:
      जुलाई 30, 2026 को 1:41 अपराह्न पर

      Thank you

      प्रतिक्रिया
  4. अंकित राज कहते हैं:
    जुलाई 29, 2026 को 2:10 अपराह्न पर

    प्रणाम सर,…. अक्सर आपके लेखों को प्रयास करता हूं पढ़ने का,… प्रयास इसलिए कह रहा हूं क्योंकि थोड़ा समयाभाव के चलते असमर्थ रहता हूं। हमेशा की तरह बेहद उम्दा लेख। सुंदर और सुगठित लेखन शैली आपकी पहचान है सर। भारत के महान गुरु शिष्य परंपरा शैली के अंतर्गत शिष्यों ने सदैव अपने गुरु के स्वरूप को उजागर, मान-संरक्षण और आदर किया है।
    जैसे रामानंद जी को संत कबीर ने, संत शिरोमणि रविदास को मीराबाई ने, नरहरी दास को तुलसीदास ने, पं० हजारी प्रसाद द्विवेदी को विश्वनाथ त्रिपाठी और नामवर सिंह ने…. अपने गुरु के प्रति इतनी आसक्ति और प्रेम ही शिष्य को महान बनाती है। समकालीन समय में यह परंपरा आज भी चली आ रही है….. आशा है आगे भी चलती रहेगी।
    गुरु वह अक्षय आलोक हैं, जिनकी दिव्य प्रभा में अज्ञान का तम स्वयं विलीन हो जाता है।
    “सा विद्या या विमुक्तये।”
    — विष्णु पुराण
    गुरु वह चेतना हैं, जिनके सानिध्य में जिज्ञासा तप बनती है, तप साधना बनता है और साधना अंततः आत्मबोध में परिणत होता है। उनका सान्निध्य मनुष्य को केवल विद्वत्ता ही नहीं, अपितु विवेक, विनय और आत्मबोध का भी अधिकारी बनाता है।
    गुरु पूर्णिमा उस दिव्य परंपरा के प्रति कर्तव्य का पर्व है, जिसने युगों से ज्ञान ज्योति को अक्षुण्ण रखा है।
    गुरु पूर्णिमा के इस शुभ अवसर पर सभी गुरुजनों को मेरा नमन।🙏🏻🙏🏻🙏🏻💐💐💐

    प्रतिक्रिया
    1. Dr. Raj Bahadur Mourya कहते हैं:
      जुलाई 29, 2026 को 8:15 अपराह्न पर

      तहेदिल से शुक्रिया आपका भाई जी

      प्रतिक्रिया
  5. Rajkumar Chaudhary कहते हैं:
    जुलाई 28, 2026 को 11:14 पूर्वाह्न पर

    गरिमामई पदों को सुशोभित करने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी आदरणीय पिता तुल्य डॉ मधुसूदन मिश्रा सर के चरणों में सादर चरण वंदन।
    आज परम आदरणीय डॉक्टर राजबहादुर मौर्य सर के ब्लॉग में आदरणीय डॉक्टर मधुसूदन मिश्र साहब की उपलब्धियां एवं उनके जीवन की शैक्षिक यात्रा के बारे में पड़कर ऐसा प्रतीत हुआ मानो जैसे हमारे सर हमारे सामने ही खड़े हो, मजाल है कि मिश्रा साहब की चाल की कोई बराबरी कर पाए, बहुत ही नपे तुले और प्रभावशाली शब्दों में उनकी हर व्याख्या होती थी,बस यूं समझ लीजिए देवों की तुलना शब्दों में कोई क्या नापेगा।
    मेरी PhD की उपाधि मेरे सर डॉक्टर मधुसूदन मिश्र साहब का आशीर्वाद एवं डॉक्टर राजबहादुर मौर्य सर के मार्गदर्शन का नतीजा है,
    मै सपरिवार अपने आदरणीय डॉक्टर मधुसूदन मिश्र साहब की स्वास्थ्य लाभ की ईश्वर से प्रार्थना करता रहता हूं
    मै पहला ऐसा स्टूडेंट था जिसे स्कूल में गुरुमाता के रूप में सर की पत्नी श्रीमती उर्मिला मिश्र जी का आशीर्वाद मिला और कॉलेज में सर का,
    अभी सर का एक आदेश पूरा करना बाकी है
    डॉ राजकुमार चौधरी

    प्रतिक्रिया
    1. Dr. Raj Bahadur Mourya कहते हैं:
      जुलाई 29, 2026 को 8:17 अपराह्न पर

      वाक़ई आपने गुरु जी का हमेशा सम्मान बढ़ाया है । हम आपके मंगलमय जीवन की कामना करते और दिल की गहराइयों से आपको आशीर्वाद देते हैं ।

      प्रतिक्रिया
  6. बृजेश कुमार कहते हैं:
    जुलाई 28, 2026 को 8:23 पूर्वाह्न पर

    सर प्रणाम,
    आपने सर के बारे में बहुत ही रोचक जानकारी साझा किए है,सर वास्तव में प्रतिभा के धनी है,सर ने बहुत कुछ हासिल किया है,आज हम उनसे बहुत कुछ सीखते है।

    प्रतिक्रिया
    1. Dr. Raj Bahadur Mourya कहते हैं:
      जुलाई 29, 2026 को 8:18 अपराह्न पर

      शुक्रिया आपका भाई जी हौसलाअफ़जाई के लिए ।

      प्रतिक्रिया
  7. Ashutosh dwivedi कहते हैं:
    जुलाई 25, 2026 को 4:57 अपराह्न पर

    Apnea jivanshaiily se anushashan ka path papaya, karmnishth Rahe,pita ji ka samman badaya, Bachchan ko karmnishth banaya,……apane Vishay par sampurn pakad,….patrakarita ka junoon..smart lifestyle,……achchhe karmon ka Parinam…best life in Singapore.

    प्रतिक्रिया
    1. Dr. Raj Bahadur Mourya कहते हैं:
      जुलाई 29, 2026 को 8:19 अपराह्न पर

      Thank you Ashutosh ji

      प्रतिक्रिया

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